त्रिविध शरीर

त्रिविध शरीर

मोक्षाभिलाषियों को दुरन्त संसारसागर से पार जाने के लिए आत्मचिन्तन अत्यावश्यक है । कोई भी सम्प्रदाय हो यदि उसका साधक आत्मचिन्तन नहीं करता तो वह संसार से मुक्त नहीं हो सकता । संसरण का मूल कारण अपने स्वरूप की विस्मृति है । और इसका प्रभाव यह कि हम देह गेह एवं तत्सम्बन्धियों में रच पच रहे हैं । 

जब तक हम स्वयं को देह से भिन्न नहीं समझेंगे तब तक यह संसार चलता रहेगा । स्वयं को देह से भिन्न समझने के लिए देह के स्वरूपों का ज्ञान परमावश्यक है । 

देह ३ प्रकार के है ।१-स्थूल शरीर, २-सूक्ष्म शरीर, और तीसरा कारण शरीर ।

स्थूल शरीर- रक्त चर्म मज्जा अस्थि मेद एवं त्वचा आदि से युक्त तथा हाथ पैर मस्तक पीठ वक्षस्थल आदि अंगों अंगुली आदि उपांगों से संयुक्त जो देह है । यही स्थूल शरीर है । इसी में हमारी " अहं बुद्धि ( मैं मैं इस प्रकार की बुद्धि ) होती है । और पीड़ा आदि होने पर मम बुद्धि( हमारे देह में पीड़ा हो रही है । इस प्रकार मम बुद्धि ) होती है । 
 इसकी रचना पंचीकृत पंचभूत पृथिवी,जल,तेज़,वायु और आकाश से होती है । तत्तद्भूतों की पाँच तन्मात्रायें शब्दादि ही पाँच विषय हैं ।

इसमें पंच महाभूत, पंच प्राण, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और ५ कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि चित्त, और अहंकार ये सब मिलकर २४ तत्त्व हैं । जाग्रत अवस्था में पूर्वोपार्जित कर्मों के फलोपभोग हेतु यह देह मिला है । सम्पूर्ण बाह्य जगत् का व्यवहार का आश्रय यही स्थूल शरीर है ।  मलमूत्र का आश्रय यह शरीर यद्यपि निन्दनीय है--

"पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूलं निन्द्यमिदं वपु: ।।"-विवेकचूडामणि-८९

तथापि सद्गुरु का आश्रय लेकर इस स्थूल शरीररूपी नौका से भवसागर पार किया जा सकता है । 

सूक्ष्मशरीर- पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ पंच प्राण, अपञ्चीकृत पृथिवी आदि  सूक्ष्म पंच भूत, मन बुद्धि, चित्त, अहंकार, अविद्या, वासनायें एवं कर्म ये सब मिलकर सूक्ष्म शरीर कहलाते हैं । इसे पुर्यष्टक भी कहते हैं । --

वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च प्राणादि पञ्चाभ्रमुखानि पञ्च । 
बुद्ध्यादिविध्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु: ।।
          -विवेकचूडामणि-९८

इसे ही लिंग शरीर भी कहते हैं । स्वप्नावस्था के समग्र व्यवहार इसी देह से होते हैं । यह आत्मा की अनादि उपाधि है । योगिजन इसी शरीर द्वारा अनेक लोकों का भ्रमण करते हैं ।

कारणशरीर- त्रिगुणात्मिका माया जिसे प्रकृति,अविद्या अज्ञान आदि नामों से जाना जाता है । वही आत्मा का कारण शरीर है । सुषुप्ति अवस्था में इसी कारणशरीर में जीवात्मा स्थित रहता है । इस देह में सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं बुद्धि किसी का कोई भी व्यापार नहीं चलता । इससे जाग्रत अवस्था में आने पर लोग कहते हैं कि -"सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषम्" ( मैं सुख से सोया, कुछ भी पता नहीं चला ) । इस शरीर में इन्द्रियादिका सर्वथा अभाव है । केवल बुद्धि ही बीजरूप में श्थित रहती है । उसका कोई भी व्यापार अनुभूत नहीं होता ।

माया ( प्रकृति) एवं महत्तत्त्व से लेकर देहपर्यन्त माया के समस्त कार्य असत्, अनात्मा हैं । इनकी प्रतीति मरुस्थल में जलवत् ही है ।--

माया मायाकार्यं सर्वं महदादिदेहपर्यन्तम् ।
असदिदमनात्मतत्त्वं विद्धि त्वं मरुमरीचिकाकल्पम् ।।
   - विवेकचूडामण-१२५

आत्मा इन सबसे भिन्न सच्चिदानन्द स्वरूप है । स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों शरीरों से अपने को भिन्न अनुसन्धान करते हुए आगे बढा जा सकता है ।

#आचार्यसियारामदासनैयायिक

त्रिविध शरीर
मोक्षाभिलाषियों को दुरन्त संसारसागर से पार जाने के लिए आत्मचिन्तन अत्यावश्यक है । कोई भी सम्प्रदाय हो यदि उसका साधक आत्मचिन्तन नहीं करता तो वह संसार से मुक्त नहीं हो सकता । संसरण का मूल कारण अपने स्वरूप की विस्मृति है । और इसका प्रभाव यह कि हम देह गेह एवं तत्सम्बन्धियों में रच पच रहे हैं ।
जब तक हम स्वयं को देह से भिन्न नहीं समझेंगे तब तक यह संसार चलता रहेगा । स्वयं को देह से भिन्न समझने के लिए देह के स्वरूपों का ज्ञान परमावश्यक है ।
देह ३ प्रकार के है ।१-स्थूल शरीर, २-सूक्ष्म शरीर, और तीसरा कारण शरीर ।
स्थूल शरीर- रक्त चर्म मज्जा अस्थि मेद एवं त्वचा आदि से युक्त तथा हाथ पैर मस्तक पीठ वक्षस्थल आदि अंगों अंगुली आदि उपांगों से संयुक्त जो देह है । यही स्थूल शरीर है । इसी में हमारी ” अहं बुद्धि ( मैं मैं इस प्रकार की बुद्धि ) होती है । और पीड़ा आदि होने पर मम बुद्धि( हमारे देह में पीड़ा हो रही है । इस प्रकार मम बुद्धि ) होती है ।
इसकी रचना पंचीकृत पंचभूत पृथिवी,जल,तेज़,वायु और आकाश से होती है । तत्तद्भूतों की पाँच तन्मात्रायें शब्दादि ही पाँच विषय हैं ।
इसमें पंच महाभूत, पंच प्राण, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और ५ कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि चित्त, और अहंकार ये सब मिलकर २४ तत्त्व हैं । जाग्रत अवस्था में पूर्वोपार्जित कर्मों के फलोपभोग हेतु यह देह मिला है । सम्पूर्ण बाह्य जगत् का व्यवहार का आश्रय यही स्थूल शरीर है । मलमूत्र का आश्रय यह शरीर यद्यपि निन्दनीय है–
“पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूलं निन्द्यमिदं वपु: ..”-विवेकचूडामणि-८९
तथापि सद्गुरु का आश्रय लेकर इस स्थूल शरीररूपी नौका से भवसागर पार किया जा सकता है ।
सूक्ष्मशरीर- पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ पंच प्राण, अपञ्चीकृत पृथिवी आदि सूक्ष्म पंच भूत, मन बुद्धि, चित्त, अहंकार, अविद्या, वासनायें एवं कर्म ये सब मिलकर सूक्ष्म शरीर कहलाते हैं । इसे पुर्यष्टक भी कहते हैं । –
वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च प्राणादि पञ्चाभ्रमुखानि पञ्च ।
बुद्ध्यादिविध्यापि च कामकर्मणी पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहु: ..
-विवेकचूडामणि-९८
इसे ही लिंग शरीर भी कहते हैं । स्वप्नावस्था के समग्र व्यवहार इसी देह से होते हैं । यह आत्मा की अनादि उपाधि है । योगिजन इसी शरीर द्वारा अनेक लोकों का भ्रमण करते हैं ।
कारणशरीर- त्रिगुणात्मिका माया जिसे प्रकृति,अविद्या,अज्ञान आदि नामों से जाना जाता है । वही आत्मा का कारण शरीर है । सुषुप्ति अवस्था में इसी कारणशरीर में जीवात्मा स्थित रहता है । इस देह में सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं बुद्धि किसी का कोई भी व्यापार नहीं चलता । इससे जाग्रत अवस्था में आने पर लोग कहते हैं कि -”सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषम्” ( मैं सुख से सोया, कुछ भी पता नहीं चला ) । इस शरीर में इन्द्रियादिका सर्वथा अभाव है । केवल बुद्धि ही बीजरूप में श्थित रहती है । उसका कोई भी व्यापार अनुभूत नहीं होता ।
माया ( प्रकृति) एवं महत्तत्त्व से लेकर देहपर्यन्त माया के समस्त कार्य असत्, अनात्मा हैं । इनकी प्रतीति मरुस्थल में जलवत् ही है ।–
माया मायाकार्यं सर्वं महदादिदेहपर्यन्तम् ।
असदिदमनात्मतत्त्वं विद्धि त्वं मरुमरीचिकाकल्पम् ।।
- विवेकचूडामणि-१२५
आत्मा इन सबसे भिन्न सच्चिदानन्द स्वरूप है । स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों शरीरों से अपने को भिन्न अनुसन्धान करते हुए आगे बढा जा सकता है ।
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के बारे में Acharysiyaramdas

आचार्य सियारामदास नैयायिक भूतपूर्व पीठाध्यक्ष श्रीरामानन्दाचार्यवेदान्तपीठ जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, मदाऊ,पो0 भाँकरोटा , जयपुर, राजस्थान ईमेल:guruji@acharysiyaramdas.com: +91-9460117766

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