श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय द्वितीय श्लोक की व्याख्या

श्रीभगवानुवाच

 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥

 व्याख्या—अर्जुन के मोह का विद्रावक वचन श्रीभगवान् आरम्भ कर रहे हैं । श्रीभगवान्= श्री आदरसूचक है । समग्र ऐश्वर्य , धर्म ,यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य -इन छहो गुणों का नाम भग है ।ये छहों जिनमें सर्वदा रहते हैं । उन्हें भगवान् कहते हैं । 

 ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशस: श्रिय: । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङगना  ॥—विष्णुपुराण-६/७४,

 इसीलिए पार्थ को ऐश्वर्य, धर्म, यश आदि प्राप्त कराने की इच्छा से भगवान् कहते हैं । 

 हे अर्जुन= पार्थ ! त्वा = तुमको इदं = यह,  कश्मलं= अपने वर्णाश्रमधर्म से पराङ्मुखतारूपी मलिन विचार ( मैं अहिंसा रूपी परम धर्म का पालन करूंगा और भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करूंगा पर युद्ध नहीं करूंगा ), कुत: = कहां से, विषमे= इस अनुपयुक्त स्थल में, समुपस्थितम्= प्राप्त हुआ ? यह, अनार्यजुष्टं= अनार्यों से सेवित अर्थात् आर्यों= शिष्टपुरुषों से त्याज्य है । वेदप्रामाण्य को मानते हुए जो वेदोक्त कर्मों का अनुष्टान करते हैं उन्हें शिष्ट कहा जाता है । धर्म वेदविहित है और अधर्म त्याज्य है । अत: पार्थ ! तुम्हारी यह धर्मपराङ्मुखता मात्र अधर्म है ।यदि तुम मोक्ष की इच्छा से स्ववर्णाश्रमधर्म का त्याग कर रहे हो तो तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता ; क्योंकि धर्म का पालन करने से स्वान्त की शुद्धि होकर भगवत्प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा होती है जिससे मोक्ष प्राप्त होता है । अत: तुम्हारे सदृश मुमक्षुओं को अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए । 

 ध्यातव्य है कि यदि जाति कर्मणा होती तो अर्जुन पर भगवान् मधुसूदन अनार्यजुष्ट शब्द से आक्षेप नहीं करते । और पार्थ माधव की बात भी नहीं मानते । कह देते कि अहिंसा और भिक्षावृत्ति ब्राह्मण का धर्म हैं । मैं उसे स्वीकार करूंगा तब ब्राह्णण हो जाउंगा । किन्तु अर्जुन का ऐसा न कहना सिद्ध करता है कि जाति कर्मणा नहीं अपित् जन्मना ही होती है ।अग्रिम “ स्वधर्मे निधनं श्रेय: —“ से भी यही बात सिद्ध होती है । कर्मणा जाति मानने पर जो कर्म करेंगे उसी के आधार पर जाति सिद्ध होगी फिर वह परधर्म कैसे होगा । यह तो तभी सम्भव है जब हम जाति को जन्मना स्वीकार करें ।अस्तु ।

 अस्वर्ग्यं= स्वर्गविरोधी नरक को प्राप्त कराने वाला, यहां नञर्थ असुर: की भांति विरुद्ध अर्थ में है । अत: स्वर्ग की इच्छा से भी तुम्हें अपने वर्णाश्रमधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए । अहिंसा और भिक्षावृत्ति तुम्हें नरक ले जायेगी । अकीर्तिकरम्= अपकीर्तिकारक, यह धर्मत्याग और परधर्म का सेवन तुम्हारी अपकीर्ति का जनक होगा । अत: चाहे मोक्ष की इच्छा हो या स्वर्ग अथवा कीर्ति की । इसके लिए तुम्हें यह विषाद और अहिंसा को परम धर्म समझना तथा भिक्षा वृत्ति से जीवन निर्वाह की इच्छा इन सबका त्याग करना ही पड़ेगा । इन सबको भगवान् आगे क्लैब्य शब्द से कहेंगे । 

 आज हिन्दुओं को जो अहिंसा का पाठ पढाने के साथ सहनशीलता सिखायी जाती है ।और भिक्षावृत्ति बनाम जीती हुई जमीन दुष्टों को लौटायी गयी या लौटायी जाती है । उसी का परिणाम है देश में आतंकवाद और नापाक देश की सीमा पर काली करतूतें तथा विदेशी बर्बर मुश्लिमों को शरणार्थी मानना ।

 गीता के द्वारा यही सन्देश दिया जा रहा है कि वर्तमान परिस्थिति में दुष्टों का दलन, उनकी भूमि पर धर्मपूर्वक प्रजापालन और लुटेरे मुश्लिमों का निष्कासन यही राष्ट्रधर्म है । जो देशद्रोह करे वह प्रजा नहीं ।

 —#आचार्यसियारामदासनैयायिक

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आचार्य सियारामदास नैयायिक भूतपूर्व पीठाध्यक्ष श्रीरामानन्दाचार्यवेदान्तपीठ जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, मदाऊ,पो0 भाँकरोटा , जयपुर, राजस्थान ईमेल:guruji@acharysiyaramdas.com: +91-9460117766

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