यां चिन्तयामि सततं सा मयि विरक्ता

  महाराज भर्तृहरि अपनी पट्टमहिषी को प्राणों से भी अधिक प्रेम करते थे । और उसने नाटक भी कुछ ऐसा ही किया था कि महाराज की भावना उसके प्रति दृढ होती जा रही थी । वह उनके अश्वपाल पर फिदा थी और वह अश्वपाल एक राजवेश्या पर । 

महाराज ने एक योगी से प्राप्त अमरफल अपनी प्रियतमा को दिया और उसने उसे अश्वपाल को दे दिया । अश्वपाल ने वह फल अपनी प्रेमिका राजवेश्या को दे दिया । उस वेश्या ने वह फल महाराज भर्तृहरि को दे दिया । सोची कि हम इसे खाकर अगर अमर हो गये  तो पाप ही कमायेंगे । राजा अमर हो जाय तो धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करेगा । इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर वेश्या ने वह फल महाराज को भरे दरबार में दिया ।  

 भर्तृहरि को पत्नी पिंङ्गला के पास से फल अश्वपाल से होते हुए वेश्या के पास कैसे पहुँचा -- इसका पता पूंछताछ करने पर चला । सोचने लगे --जिसका चिन्तन मैं सतत करता हूँ । वह मेरा नहीं अपितु परपुरुष अश्वपाल का चिन्तन करती है । और वह अश्वपाल भी  प्यार का नाटक करते हुए पिंगला को धोखा दे रहा है ; क्योंकि वह एक वेश्या पर फिदा है । और ये वेश्या अश्वपाल नहीं अपितु मुझ पर आसक्त है । इसलिए मुँह से बरबस निकल पड़ा -- 

 "यां चिन्तयामि सततं सा मयि विरक्ता-"  "

तात्पर्य यह कि संसार में निष्कपट प्रेम बड़ा दुर्लभ है । वह कहीं कहीं विरले में ही दिखता है ।   --#आचार्यसियारामदासनैयायिक

यां चिन्तयामि सततं सा मयि विरक्ता


महाराज भर्तृहरि अपनी पट्टमहिषी को प्राणों से भी अधिक प्रेम करते थे । और उसने नाटक भी कुछ ऐसा ही किया था कि महाराज की भावना उसके प्रति दृढ होती जा रही थी । वह उनके अश्वपाल पर फिदा थी और वह अश्वपाल एक राजवेश्या पर । महाराज ने एक योगी से प्राप्त अमरफल अपनी प्रियतमा को दिया और उसने उसे अश्वपाल को दे दिया । अश्वपाल ने वह फल अपनी प्रेमिका राजवेश्या को दे दिया । उस वेश्या ने वह फल महाराज भर्तृहरि को दे दिया । सोची कि हम इसे खाकर अगर अमर हो गये तो पाप ही कमायेंगे । राजा अमर हो जाय तो धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करेगा । इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर वेश्या ने वह फल महाराज को भरे दरबार में दिया ।

भर्तृहरि को पत्नी पिंङ्गला के पास से फल अश्वपाल से होते हुए वेश्या के पास कैसे पहुँचा — इसका पता पूंछताछ करने पर चला । सोचने लगे –जिसका चिन्तन मैं सतत करता हूँ । वह मेरा नहीं अपितु परपुरुष अश्वपाल का चिन्तन करती है । और वह अश्वपाल भी प्यार का नाटक करते हुए पिंगला को धोखा दे रहा है ; क्योंकि वह एक वेश्या पर फिदा है । और ये वेश्या अश्वपाल नहीं अपितु मुझ पर आसक्त है । इसलिए मुँह से बरबस निकल पड़ा –

“यां चिन्तयामि सततं सा मयि विरक्ता-”

“तात्पर्य यह कि संसार में निष्कपट प्रेम बड़ा दुर्लभ है । वह कहीं कहीं विरले में ही दिखता है ।

–#आचार्यसियारामदासनैयायिक

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आचार्य सियारामदास नैयायिक भूतपूर्व पीठाध्यक्ष श्रीरामानन्दाचार्यवेदान्तपीठ जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, मदाऊ,पो0 भाँकरोटा , जयपुर, राजस्थान ईमेल:guruji@acharysiyaramdas.com: +91-9460117766

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