श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय —१

 

श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीयोSध्याय: 

संजय उवाच

 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: ॥१॥

ऑ व्याख्या— अहिंसा और उसके साथ भिक्षा मांगकर खाना परम धर्म है — इस प्रकार की सोच से युद्धविमुख अर्जुन को जानकर धृतराष्ट्र को हर्ष हुआ । हमारे पुत्र का राज्य अब अचल हो गया – इस विचारधारा में प्रवहमान प्रसन्नचित्त धृतराष्ट्र की “इसके बाद क्या हुआ” -इत्याकारक जिज्ञासा के शमनार्थ संजय बोले ।तथा= उस प्रकार, कृपयाविष्टं= मैं इनका सम्बन्धी हूं और ये मेरे सम्बन्धी हैं-इस प्रकार भ्रमात्मकनिश्चय से जन्य स्नेहविशेषात्मक कृपा से आविष्ट, अश्रुपूर्णकुलेक्षणं= आंसुओं से भरे तथा देखने में असमर्थ,एवं, विषीदन्तं= विषादग्रस्त, तं= उन पार्थ से,इदं = वक्ष्यमाण= आगामी, वाक्यं= वचन, मधुसूदन=स्वयं मधु जैसे वेदविज्ञान के अपहर्ता दुष्ट का विध्वंस करने वाले भगवान् बोले ।

 कृपयाविष्टं+ जैसे भूत से आविष्ट व्यक्ति में भूतावेश आगन्तुक दोष है वैसे ही यह अर्जुननिष्ठकृपाख्य स्नेह है—यह शंका नहीं करनी चाहिए; क्योंकि यह मेरा है और मैं इसका हूं—इस तरह के व्यामोह से जीव सदा ही ग्रस्त रहता है ।अत: यह स्वाभाविक है । भूतावेश सभी को नहीं होता और वह सदा नहीं रहता इसलिए उसे आगन्तुक कहते हैं । आगन्तुक दोषों को हटाया जा सकता है । पर अहन्ता और ममता को सद्गुरु के तत्त्वोपदेश विना कोई नहीं हटा सकता । इसीलिए अग्रिम “कुत्स्त्वा कल्मषमिदं—“ इत्यादि सोपपत्तिक 

वचनात्मक गीतोपदेश भगवान् प्रारम्भ करते हैं ।

 

मधुसूदन:— मधु जैसे दुष्ट का विनाश करने वाले भगवान् आपके दुर्योधन आदि दुष्ट पुत्रों का  भीम आदि से प्रणाश अवश्य करा देंगे । इसलिए आपको अर्जुन की युद्धविमुखता से प्रसन्न नहीं होना चाहिए ।

 विषीदन्तं= विषादं कुर्वन्तं, विषाद कर्म है और अर्जुन कर्ता । विषाद दोष आगन्तुक होने से उसका विनाश सहज दोष की अपेक्षया सुकर है ।

—#आचार्यसियारामदासनैयायिक

 

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आचार्य सियारामदास नैयायिक भूतपूर्व पीठाध्यक्ष श्रीरामानन्दाचार्यवेदान्तपीठ जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, मदाऊ,पो0 भाँकरोटा , जयपुर, राजस्थान ईमेल:guruji@acharysiyaramdas.com: +91-9460117766

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