साधनचतुष्टय

 

निश्चलानन्द सरस्वती

जो विवेकी वैराग्यवान्, शमादिषट्कसम्पत्ति से युक्त तथा मोक्षाभिलाषी हो वही ब्रह्मजिज्ञासा के योग्य है ।–
 
“विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुणशालिन: । मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मता ।।”
–विवेकचूडामणि-१७
 
विवेक, वैराग्य, शमादिषट्कसम्पत्ति तथा ममुक्षत्व ये चार साधन मोक्षमार्ग में अत्यावश्यक हैं । 
 
१- विवेक–परमात्मा नित्य है और उससे भिन्न सकल जगत् मिथ्या है –इस प्रकार का निश्चय ही विवेक कहलाता है ।–
 
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवं रूपो विनिश्चय: । सोSयं नित्यानित्यवस्तुविवेक: समुदाहृत: ..–विवेकचूडामणि-२०-२१
 
२- वैराग्य– जितनी भी वस्तुएँ दिखती या शास्त्रादि प्रमाणों से सुनायी देती हैं । उन  ऐहिक और पारलौकिक
 ( ब्रह्मलोक तक की ) सभी वस्तुओं में अनुराग न होना ही वैराग्य है । जब अनित्य वस्तुओं का ज्ञान हमें शास्त्र एवं गुरु की कृपा से हो गया तब उनके भोग की इच्छाओं का परित्याग करना चाहिए । 
 
३- शमादिषट्कसम्पत्ति- शम,दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान ये साधक की सम्पत्तियाँ हैं ।  इनके विना वह अध्यात्म जगत् में निर्धन है । इसलिए इन छहों को शमादिषट्कसम्पत्ति कहा जाता है ।
 
1-शम –शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श इन विषयों में दोषदृष्टि करते हुए इनसे मन को हटाकर अपने लक्ष्य भगवान् में उसे लगाना ही शम है । जबतक विषयों में दोषदृष्टि नहीं होगी तब तक उनका त्याग असम्भव हैं । अत: दोषदृष्टि करते हुए त्याग के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए ।
 
2-दम– ५ ज्ञानेन्द्रिय और ५ कर्मेन्द्रियों को विषयों से खींचकर उनके स्थान पर स्थित कर देना दम कहलाता है ।
 
२ प्रकार की इन्द्रियाँ हैं । अन्तरिन्द्रिय एवं बाह्येन्द्रिय । अन्तरिन्द्रिय मन के निग्रह को शम तथा पूर्वोक्त बाह्येन्द्रियों 
के निग्रह को दम कहा जाता है ।
 
3-उपरति– चित्त की वृत्तियाँ कभी घटाकार होती हैं तो कभी पटाकार । जिन विषयों मे मन गया वृत्तियाँ उस विषय के अनुरूप बन जाती हैं । जैसे पानी खेत में जाता है तो खेत के स्वरूपानुरूप वह फैल जाता है । खेत जैसा ही टेढ़ा मेढ़ा क्यों न हो । यही हाल चित्त का है । नारी में गया तो नारी का आकार और परमात्मा में गया तो ब्रह्माकार हो जाता है । अत एव जितने भी बाह्य विषय हैं जब वे मन के विषय न बनें । अर्थात् मन निर्निषय हो जाय । तो इस अवस्था को उपरति कहते हैं । यह मुक्ति के लिए अत्यावश्यक है । इसीलिए कहा गया –”मुक्त्यै निर्विषयं मन:” । विषय निर्मुक्त मन मुक्ति का साधक है । 
 
4-तितिक्षा — प्रतीकार किये विना चिन्ता और शोकादि से रहित होकर प्रारब्धानुसार प्राप्त सम्पूर्ण दु: खों को सहन 
करना ही तितिक्षा है । यह ऐसा साधन है जिसके विना अध्यात्म जगत् में बढ़ना असम्भव है । इसीलिए भगवान् 
वासुदेव ने अर्जुन को तितिक्षा पर बल देने को कहा–”तांस्तितिक्षस्व भारत।।”-भगवद्गीता
 
5-श्रद्धा–शास्त्र और गुरु के वचनों में -ये सत्य ही हैं-इस प्रकार दृढ निश्चय श्रद्धा कहलाता है । इसके विना परमात्मतत्त्व की उपलब्धि हो ही नहीं सकती । अत एव गीता में उद्घोष किया गया कि श्रद्धावान् ही ज्ञान को प्राप्त करता है–”श्रद्धावांल्लभते ज्ञानम् ” .
 
6-समाधान– परमपावन परमात्मा में बुद्धि को स्थिर करना समाधान है । इसी को समाधि भी कहते हैं । चित्त को उसकी अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त कराना समाधान नहीं है ।
 
४- चतुर्थ साधन है मुमुक्षत्व । मुक्त होने की इच्छा ही मुमुक्षत्व है । अज्ञान से कल्पित समस्त जड़ वस्तुओं देह गेह और उनके सम्बन्धियों से परमात्मस्वरूप के ज्ञान द्वारा मुक्त होने की इच्छा मुमुक्षता कहलाती है । 
 
यह मुमुक्षता वैराग्य एवं शमादिषट्कसम्पत्ति तथा गुरु के अनुग्रह से बढ़कर मोक्ष रूपी फल प्रकट करती है । वस्तुत: 
शमादि साधन उसी को लाभ पहुँचा पाते हैं जिस सौभाग्यशाली में तीव्र वैराग्य और मुमुक्षत्व हो । जिस साधक में वैराग्य और मुमुक्षत्व मन्द हैं । वहाँ शम दमदि केवल भासित ही होते हैं । जैसे मरुस्थल में जल । 
 
इसलिए प्रत्येक साधक को चाहे वह विचारक हो या आराधक मुमुक्षत्व और वैराग्य परमावश्यक है । इसके विना अध्यात्म मार्ग में बढ़ना असम्भव ही है ।
 
–#आचार्यसियारामदासनैयायिक
 

 

 

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आचार्य सियारामदास नैयायिक श्रीरामानन्दाचार्यवेदान्तपीठाध्यक्ष जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, मदाऊ,पो0 भाँकरोटा , जयपुर, राजस्थान ईमेल:guruji@acharysiyaramdas.com: +91-8104248586, +91-9460117766

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