आचार्य जी के बारे में

आचार्य सियारामदास नैयायिक

जीवनवृत्त–

नाम- आचार्य सियारामदास नैयायिक

जन्मतिथि —1/10/1967

लिंग- पुरुष

आश्रम- सन्न्यास

गुरुदेव—– महान्त श्रीनृत्यगोपालदास शास्त्री

अध्यक्ष—श्रीरामजन्मभूमिन्यास समिति

श्रीमणिरामदासछावनी सेवाट्रस्ट, अयोध्या,फैजाबाद, उत्तर प्रदेश,भारत ।

>>>>>>>> शैक्षणिक योग्यता<<<<<<<<<<

न्यायाचार्य—सन् 1989

वेदान्ताचार्य–सन् 1992

स्वतन्त्र अध्ययन —-नव्य व्याकरण, साहित्य, पूर्वमीमांसा,आदि

अध्ययन सान्निध्य–अयोध्या में — श्रीरामदुलारे शुक्ल, श्रीदयानन्द द्विवेदी,श्रीरामलखनपाठक, श्रीरुद्र प्रसाद अवस्थी( न्याय शास्त्र) श्रीरूपनारायण मिश्र जी –ये व्याकरण के गुरुजन हैं ।

>>>>>>काशी में<<<<<<

श्रीबदरीनाथ शुक्ल,श्रीजयरामशुक्ल,श्रीविश्वनाथ शास्त्री दातार, श्रीहोश्मने जी,श्रीरामकृष्णभट्ट,श्रीरामचन्द्र त्रिपाठी , श्रीसुधाकर दीक्षित श्रीवशिष्ठ त्रिपाठी ,श्रीराम पाण्डेय जी न्यायशास्त्र के गुरुजन हैं । श्रीपुरुषोत्तमत्रिपाठी,श्रीरामप्रीति द्विवेदी, श्रीशशिधर मिश्र जी व्याकरण के गुरुजन हैं ।

पूर्वमीमांसा के गुरुजन — श्रीपट्टाभिराम शास्त्री,डा0एन0आर0श्रीनिवासन्,श्रीस्वामीयोगीन्द्रानन्द जी महाराज

वेदान्त के गुरुजन–श्रीस्वामी योगीन्द्रानन्द जी, डा0एन0आर0श्रीनिवासन् जी,श्रीरामचन्द्र त्रिपाठी जी श्रीपारससनाथ द्विवेदी जी ,

साहित्य के गुरुदेव— श्रीवायुनन्दन पाण्डेय जी ।

साधना के गुरुदेव–श्रीसीतारामदास जी महाराज (शास्त्री जी मधुकरिया) ,श्रीगंगादास जी महाराज पुरी,श्रीभगवान् दास जी महाराज (उत्तरकाशी)

अध्यापन–श्रीमणिरामदासछावनी सेवाट्रस्ट अयोध्या (श्रीवामदेव आश्रम प्रमोदवन)में 5वर्ष संस्कृत टीकाओं सहित भागवत महापुराण एवं श्रीमद्वाल्मीकि रामायण का टीकाओं के सहित शोधपरक अध्यापन,न्याय व्याकरण, वेदान्त तथा अध्यात्म रामायण का अध्यापन ।

>>>>>जयपुर<<<<<

आप सन् 2006 सितम्बर से “जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय”, मदाऊ,पो0भाँकरोटा ,जयपुर,राजस्थान में “श्रीरामानन्दाचार्य वेदान्त पीठाध्यक्ष” के रूप में विशिष्टावास-६ में विराजमान हैं । न्याय, व्याकरण,वेदान्त आदि विषयों पर अध्यापन,लेक्चरर,रीडर एवं प्रोफेसर तथा शोधार्थियों को मार्गदर्शन, शोधपरक ग्रन्थों का लेखन, विविध विद्वत्संगोष्ठियों में शोधपूर्ण व्याख्यान जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ।

कथा —श्रीमद्भागवत एवं श्रीमद्वाल्मीकि रामायण तथा अन्य पुराणों एवं गीता आदि ।

शोध प्रबन्ध —नव्य-न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र से सम्बद्ध भगवन्नामकौमुदी पर संस्कृत व्याख्या—”भगवन्नाम कौमुद्या व्याख्यानं तत्र मीमांसान्यायानां विवेचनञ्च “. -

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, सन्1993. में ।

>>>>>>>>रचनायें<<<<<<<<

भ्रान्तिगिरिभंग— यह ग्रन्थ 400 पृष्ठों का है। इसमें भ्रान्तिरूपी पर्वतों को धूलिधूसरित कर दिया गया है । महावैयाकरण नागेश भट्ट से लेकर प्रभात शास्त्री तक के विद्वानों की मान्यताओं का निराकरण इसमें द्रष्टव्य
है ।

वैष्णववस्त्रविमर्श —-इसमें वैष्णवों के श्वेत वस्त्र का प्रतिपादन है। इसकी पृष्ठ संख्या लगभग 40 है ।

3-”भगवन्नाम कौमुदी” पर संस्कृत हिन्दी व्याख्या J.R.R.S.U. Jaipur में प्रकाशनाधीन ।

4- रामतापनीयोपनिषद् की विस्तृत हिन्दी व्याख्या ।

5-रामस्तवराज की विशद हिन्दी व्याख्या ।

6-पुरुषसूक्त की विस्तृत हिन्दी ।

7- श्रीसूक्त की विशद हिन्दी व्याख्या

8-ईशावास्योपनिषद् की विशद हिन्दी व्याख्या

9-केनोपनिषद् की विशद हिन्दी व्याख्या

10-कठोपनिषद् की विस्तृत व्याख्या

11-नित्यकृत्यबोधकप्रबन्ध की हिन्दी व्याख्या

12-ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाखण्डनम्

13-एकादशमुख हनुमत्कवच की संस्कृत व्याख्या

>>>>>>जन्मस्थली एवं अध्ययन<<<<<<<

आपका जन्म उत्तर प्रदेश के गोनर्द (गोण्डा ) जनपद में चिन्तापण्डितपुरवा नामक ग्राम के सरयूपारीण ब्राह्मण मिश्रकुल में हुआ । हमने सुना है कि 200 शब्दो के इंग्लिश निबन्ध को आप 1 घण्टे मे याद कर लेते थे । 10वीं कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके 11वीं कक्षा में पढते समय आपने गृह त्याग दिया ।

पिता श्रीगोविन्द प्रसाद मिश्र ने आपके बडे भाई अकबाल बहादुर मिश्र को भेजकर अयोध्या से 7बार पकड़वाकर आपको घर रखने का अथक प्रयास किया । पर वह निष्फल हो गया ।

आपके दीक्षागुरु श्रीरामजन्मभूमिन्यास समिति के अध्यक्ष श्रीनृत्यगोपालदास जी महाराज श्रीमणिरामछावनी
के महान्त हैं ।

अयोध्या मे आपका अध्ययन आरम्भ हुआ। 6 मास मे लघुसिद्धान्तकौमुदी कण्ठस्थ कर उसे लगाकर प्रथमा की परीक्षा दिये । 30हजार छात्रों में सर्वोच्च अंक होने से आपको “वक्रतुण्डशुक्ल” नामक स्वर्णपदक प्राप्त
हुआ । नकल आपने संस्कृताध्ययन काल मे कभी नही किया। इसकी प्रेरणा आपको दशवीं कक्षा में “तुलसी स्मारक इण्टर कोलेज के शिक्षक श्रीरामधनसिं ह नामक एक मनोविज्ञान के गुरु से मिली थी । जो छतौनी ग्राम के हैं ।

आपके व्याकरण के विद्या गुरुओं में श्रीरामदुलारेशुक्ल श्रीदयाशड़्करद्विवेदी और सिद्धान्तकौमुदी के विशेष गुरु पण्डितप्रवर श्रीरामलखन पाठक थे । शास्त्रार्थ आप पूर्वमध्यमा से ही करना शुरू किये और शास्त्री कक्षा के छात्र को पराजित कर दिया ।

न्याय पढ़ने की इच्छा से आप काशी गये और वहां एलाहाबाद के एक महावैयाकरण श्रीपरुषोत्तमत्रिपाठी की अद्भुत अध्यापन शैली और पाण्डित्य से अभिभूत होकर आपने न्याय पढना छोड़ना चाहा तो त्रिपाठीजी ने कहा कि सरयूपारीणों में इस समय श्रीबदरीनाथशुक्ल को छोडकर कोई विशिष्ट नैयायिक नहीं है अतः न्याय
ही पढो व्याकरण तो अपने घर की विद्या है उसे जब चाहोगे पढ़ा दूंगा । उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके आपने न्याय दर्शन तथा व्याकरण पढना आरम्भ किया ।

आपके काशी में नव्यव्याकरण के गुरु त्रिपाठीजी तथा श्रीरामप्रीति द्विवेदी जी थे । व्युत्पत्तिवाद की जया टीका का कतिपय अंश आपने मुमुक्षु भवन में निवास करने वाले श्रीशशिधर मिश्र जी से पढा था ।

श्रीपरुषोत्तमत्रिपाठी जी से शास्त्रार्थरत्नावली जैसे प्रौढ ग्रन्थों का अध्ययन किया । न्यायशास्त्र पं0 श्रीराम कृष्णभट्ट, होश्मनेजी, श्रीराजेश्वरशास्त्रीजी के सुत श्रीगणेश्वर शास्त्री तथा विशेषरूप से श्रीविश्वनाथशास्त्री दातार जी से आपने पढा । काशीनरेश के राजकुमार के गुरुजी श्रीजयराम शुक्ल जी से आपने सामान्यनिरुक्ति का गोलोकी क्रोडपत् रआदि ग्रन्थ पढा ।

इन दाक्षिणात्य विद्वानों के अतिरिक्त उत्तरभारत के सुप्रसिद्ध विद्वान् श्रीराम पाण्डेयजी, श्रीवशिष्ठ त्रिपाठी जी, श्रीसुधाकरदीक्षित जी से भी आपने न्याय पढा ।

साहित्य में श्रीवायुनन्दनपाण्डेय जी से “काव्यप्रकाश”पढकर श्लोकरचना की कला आपने प्राप्त की। पूर्वमीमांसा के गुरु श्रीपट्टाभिरामशास्त्री जी और स्वामी योगीन्द्रानन्द जी महाराज थे । आपको रामनगर के गुरु श्रीजयराम शुक्ल जी ने आशीष् दिया था–

“अनधीताः अपि ग्रन्थाः अधीताः भवेयुः ।”

एकबार अखण्डानन्द सरस्वती जी के द्वारा काशी मे आयोजित 200 पण्डितों की सभा में आपने मीमांसा में शास्त्रार्थ किया। आपने काशी में उदासीनसंस्कृतविद्यालय एवं सन्न्यासी कालेज मे बहुत कहने पर भी न्याय का प्रोफेसर पद स्वीकार नही किया।

आपने बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी से न्यायवेदान्त धर्मशास्त्र से सम्बद्ध भगवन्नामकौमुदी पर पी- एच0डीकी उपाधि प्राप्त किया ।

न्याय मे एक स्वर्णपदक वेदान्त मे एक स्वर्ण पदक तथा सम्पूर्णानन्द टाप करने का एक स्वर्णपदक आपको मिला। इस समय आप “जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थानसंस्कृतविश्वविद्यालय” मे “श्रीरामानन्दाचार्यवेदान्त पीठ” के अध्यक्ष हैं । शोधच्छात्रो ं से लेकर लेक्चरर, रीडर और प्रोफेसरो को मार्गदर्शन देने एवं ग्रन्थलेखन का कार्य कर रहे है।

आचार्यप्रवर के नेपाल तक अनेक छात्र है जो व्याकरणादि विषयों के अध्यापन मे लगे हुए है । शास्त्रार्थ में इनके आने की सम्भावना होने पर लोग वही समय निर्धारित करते थे जो इनके विद्यालय में उसका समय होता था । ये अपने विद्यालय को छोडकर दूसरो के यहाँ जाकर शास्त्रार्थ मे विजयी होकर लौटते थे और इनके आने पर कुछ बच्चे शास्त्रार्थ प्रक्रिया पूरी कर लेते थे क्योकि दूसरे हार के भय से आते ही नही थे ।

काशी में दक्षिणामूर्तिविद्यालय मिश्रपोखरा में न्याय दर्शन मे शास्त्रार्थ रखने की चर्चा हुई । निर्णय भी अध्यापको ने ले लिया। वही इनके गुरु पं0श्रीरामकृष्णभट्ट जी बोले कि सब ठीक है पर सियारामदास के आने पर इस विद्यालय का छात्र विजय नहीं प्राप्त कर सकता ।

अन्ततः शास्त्रार्थ न रखने का निर्णय लोगो ने लिया । ये जब गरूजी से पढने गये और शास्त्रार्थ के विषय में पूछे तो भट्ट जी ने पूरी बात बता दी ।

आचार्य जी ने कहा – गुरुदेव! मै वचन देता हूँ कि मैं यहाँ शास्त्रार्थ करने नही आऊंगा । आप शास्त्रार्थ रखवा दीजिए । आप की गरिमा बढे इसी में मेरा कल्याण है ।

गुरूजी काशी में उत्तरमध्यमा में पढने गये उस समय आपने “नित्यकृत्यबोधकप्रबन्ध”पर “रहस्यप्रकाशिका” नामक हिन्दी व्याख्या लिखी थी । उसके बाद भ्रान्तिगिरिभड़्ग ग्रन्थ लिखे जो लगभग 400 पृष्ठों का है । यह प्रौढ ग्रन्थ है बुद्धिजीवियो के लिए ।

इसके बाद वैष्णववस्त्रविमर्श की रचना हुई । पुनः किसी ने उसपर खण्डन दृष्टि से विमर्शालोक लिखा । आपने तत्काल उसका खण्डन विमर्शालोकभड़्ग लिखकर कर दिया । यह ग्रन्थ कुछ ही छप पाया ।

भगवन्नामकौमुदी जो अति क्लिष्ट है उसके लिए आपने स्वतन्त्र रूप से ३ वर्ष तक पूर्वमीमांसा पढी। जब उसकी हिन्दी व्याख्या करने लगे तो बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के श्रीनिवासन गुरु जी जो इन्हे कई मीमांसा ग्रन्थ और वेदान्त पढाये थे उन्होने शोधात्मक संस्कृत व्याख्या के रूप मे रिसर्च करने की आज्ञा दी। यह ग्रन्थ “जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय” जयपुर प्रेस में है।

आप की चिन्तन शक्ति इतनी प्रबल है कि शीघ्र ही विलक्षण निष्कर्ष पर पहुच जाते हैं । यह शक्ति आपको दातार शास्त्रीगुरूजी से मिली -ऐसा आपके मुख से मैने कई बार सुना है।

आप यह बात बार बार जोर देकर कहते है कि जिन जिन से विद्या प्राप्त हो उनके प्रति कभी ऐसा व्यवहार न करे कि उनके हृदय मे यह विचार उठे कि हमने अनधिकारी को विद्या दे दिया । गुरू के मन का एक आघात शिष्य की विद्या के लिए प्रतिबन्धक बन जाता है। अतः अपनी विद्या नही , गुरु की कृपा का विनम्र अभिमान हो । ऐसे शिष्य की विद्या कभी कुण्ठित नही होती ।

श्रीचरणों में कोटि कोटि प्रणाम

चन्द्रमौलि मिश्र, चिन्ता पंडित पुरवा, परसपुर, गोण्डा, U.P.

 

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