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    क्या भगवान् कृष्ण ने बालकों के साथ वांये हाथ से भोजन किया था ??

    Tweetआजकल भागवत के श्लोकों का परम्परया अध्ययन न होने से लोग शास्त्रविरुद्ध अर्थ की कल्पना से अनेक भाव व्यक्त करते रहते हैं । भवाभिव्यक्ति प्रशंसनीय है । पर श्लोक का अर्थ तो पहले सही लगाया जाय । देखें— प्रसंग उस समय का है जब भगवान् श्यामसुन्दर वछड़ों को चराते... और पढ़ें
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    रुद्राष्टकम् के चमत्कारी प्रयोग

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    Tweet यदि ग्रहण में रुद्राष्टक सिद्ध कर लिया जाय तो इसका प्रभाव तत्काल देखने को मिलता है । ग्रहण शुरु होने के पहले स्नान करके आसन पर बैठ जायें । ग्रहण लगते ही पाठ आरम्भ कर दें । और ग्रहण समाप्ति तक पाठ करें । इससे रुद्राष्टक सिद्ध हो जायेगा... और पढ़ें
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    “हनुमज्जयन्ती शब्द हनुमज्जन्मोत्सव की अपेक्षा विलक्षणरहस्यगर्भित है “

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    Tweetआज हनुमज्जयन्ती महोत्सव है । आजकल वाट्सएप्प से ज्ञानवितरण करने वाले एक मूर्खतापूर्ण सन्देश सर्वत्र प्रेषित कर रहे हैं कि हनुमज्यन्ती न कहकर इसे हनुमज्जन्मोत्सव कहना चाहिए ; क्योंकि जयन्ती मृतकों की मनायी जाती है । यह मात्र भ्रान्ति ही है । पहले जयन्ती का अर्थ प्रस्तुत किया जाता है... और पढ़ें
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    श्रीमद्भगवद्गीता, द्वितीय अध्याय,श्लोक-४ की व्याख्या

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    Tweet अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥४॥ व्याख्या - पूर्व में अर्जुन ने कहा था कि इस युद्ध में स्वजनों के वध से हमें नरक की प्राप्ति होगी; क्योंकि हमें इनके वध से पाप लगेगा—“पापमेवाश्रयेदस्मान्—“१/३६, मधुसूदन ! हम शोक या मोह... और पढ़ें
  • श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय द्वितीय श्लोक की व्याख्या

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    Tweetश्रीभगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥ व्याख्या—अर्जुन के मोह का विद्रावक वचन श्रीभगवान् आरम्भ कर रहे हैं । श्रीभगवान्= श्री आदरसूचक है । समग्र ऐश्वर्य , धर्म ,यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य -इन छहो गुणों का नाम भग है ।ये छहों जिनमें सर्वदा रहते हैं । उन्हें भगवान्... और पढ़ें
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    गीतागङ्गा महानदी

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    कलरव  मुरघ्नगिरिसम्भूता अनन्ताम्बुधिगामिनी। पावयत्यखिलान् लोकान् गीतागंगा महानदी।। पंचशिर मुर ( पंचपर्वा अविद्याख्यापरपर्याय अज्ञान ) के विनाशक भगवान् वासुदेव रूपी अद्रि से समुद्भूत “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्याद्याकारक श्रुतिसमुद्घोषित अविनाशी ब्रह्मस्वरूप सागरगामिनीगीतागंगारूपिणी महानदी समस्त लोकों को पवित्र कर रही हैं । —#आचार्यसियारामदासनैयायिक टिप्पणियां टिप्पणियां
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    विजया विजयं दद्यात्

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    Tweetविजया विजयं दद्यात् दशमी च दशां शुभाम् | अहं ददामि सौहार्दं सादरं नतिपूर्वकम् || –#आचार्यसियारामदासनैयायिकटिप्पणियां टिप्पणियां
  • रामपालमोहविद्रावण अनुत्तम-शब्द-विमर्श

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    Tweetभगवद्गीता के सातवें अध्याय के १८ वें श्लोक में रामपाल नामक एक महाशय “अनुत्तमां गतिम् ।।” में आये अनुत्तम (अनुत्तमां के पुल्लिंग अनुत्तम शब्द पर ) विचार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि यहां अनुत्तम का अर्थ सर्वश्रेष्ठ नहीं है । ऐसा अर्थ अज्ञानी अनाड़ी करते हैं । स्वामी निश्चलानन्द... और पढ़ें
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    संध्या और ब्रह्मगायत्री जप की संख्या का सप्रमाणविवेचन

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    कलरव  स्नान करने के पश्चात् द्विज को समयानुसार संध्या में प्रवृत्त होना चाहिए । सन्ध्या नित्य कर्म है । यदि समय स्वल्प हो तो संक्षेप में भी सन्ध्या कर लेनी चाहिए । सन्ध्या के मन्त्रों में प्राणायाम से नाड़ीशोधन होता है । मार्जन से शरीरशुद्धि और -सूर्यश्च इत्यादि मन्त्रों सेआचमन... और पढ़ें
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    सप्रमाण सविधि अनन्तचतुर्दशी ( अनन्तव्रत ) व्रत और पौराणिक कथा

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    Tweet अनन्तस्य -अनन्तसंज्ञकभगवतो विष्णो: चतुर्दशीव्रतमिति =अनन्तचतुर्दशीव्रतम् । अनन्त अर्थात् सर्वव्यापक परमात्मा भगवान् विष्णु का चतुर्दशी तिथि को किया जाने वाला व्रत । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म – श्रुति में अनन्तपद से इन्हीं भगवान् का संकेत है । इसकी चर्चा भविष्योत्तर तथा तिथ्यादितत्त्व ग्रन्थों में आयी है । यह व्रत सभी नर... और पढ़ें
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