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      क्या भगवान् कृष्ण ने बालकों के साथ वांये हाथ से भोजन किया था ??

      क्या भगवान् कृष्ण ने बालकों के साथ वांये हाथ से भोजन किया था ?? आजकल  भागवत के श्लोकों का परम्परया अध्ययन न होने से लोग शास्त्रविरुद्ध अर्थ की कल्पना से अनेक भाव व्यक्त करते रहते हैं । भवाभिव्यक्ति प्रशंसनीय है । पर श्लोक का अर्थ तो पहले सही लगाया जाय । देखें—

       
      प्रसंग उस समय का है जब भगवान् श्यामसुन्दर वछड़ों को चराते हुए बालकों के मध्य भोजन कर रहे हैं । देखें–
       
      बिभ्रद्वेणुं जठरपटयो: शृंगवेत्रे च कक्षे वामे पाणौ मसृणकवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु ।
      तिष्ठति मध्ये स्वपरिसुहृदो हास्यन् नर्मभिक्या भगवान् कृष्ण ने बालकों के साथ वांये हाथ से भोजन किया था ??: स्वै: स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञभुग्बालकेलि: ..
      –भागवतमहापुराण, १०/१३/११,
       
      अर्थ- उन्होंने मुरली को कमर की फेंट में आगे की ओर खोस लिया था । सिंगी और बेंच बग़ल में दबा लिये थे । बांये हाथ में बड़ा ही मधुर घृतमिश्रित ग्रास था । और अंगुलियों में अदरक, नींबू आदि के अचार-मुरब्बे दबा रखे थे । ग्वालबाल उनको चारों ओर से घेरकर बैठे हुए थे और वे स्वयं सबके बीच बैठकर अपनी विनोदमयी बातों से अपने साथी ग्वालबालों को हँसाते जा रहे थे । जो समस्त यज्ञों के एकमात्र भोक्ता हैं , वे ही 
      भगवान् ग्वाल बालों के साथ बैठकर इस प्रकार बाललीला करते हुए भोजन कर रहे थे और स्वर्ग के देवता आश्चर्यचकित होकर यह अद्भुत लीला देख रहे थे ।
       
      रेखांकित पंक्तियों से यह स्पष्ट हो रहा है कि प्रभु बांये हाथ से भोजन कर रहे हैं । पर श्लोकार्थ पर विचार करें तो यह भ्रम दूर हो जायेगा । श्लोक में बिभ्रद् =धारण किये हुए, शब्द पर ध्यान देने से समाधान हो जाता है । श्रीशुकदेव जी यहाँ यह बतला रहे हैं कि भगवान् ने कौन वस्तु कहाँ धारण कर रखी है ?  भागवत के प्रख्यात टीकाकार श्रीश्रीधर स्वामी जी लिखते हैं कि ” बिभ्रद् दधदिति सर्वत्र सम्बध्यते ” बिभ्रद् का सम्बन्ध वेणु की भाँति शृंगवेत्रे तथा मसृणकवलं के साथ भी है । जिसका अर्थ है कि उदरवस्त्र के मध्य में वेणु को धारण किये हुए, वाम कक्ष (भाग) में शृंग और वेंत धारण किये हुए तथा वामे पाणौ= बांये हाथ में, मसृणकवलं = स्निग्ध = (चिक्कणं मसृणं स्निग्धमित्यमर: ) दधिघृतादिमिश्रित, कवलं= ग्रास को धारण किये हुए । 
       
      ध्यातव्य है कि भगवान् का दाहिना हाथ रिक्त है । क्योंकि उससे उन्हें भोजन जो करना है । बांये हाथ में केवल ग्रास ही नहीं अपितु उसकी अंगुलियों की संधियों में दध्योदन के उपयोगी अंचार आदि भी रखे हुए हैं — यह सुस्पष्ट किया गया है । अर्थात् भगवान् ने अपने भोजन का पात्र बांये हाथ को बनाया है । मानों परम वैराग्यवान् 
      करपात्री परमहंसों को भोजन करने की शिक्षा दे रहे हों कि तुम्हारे लिए भोजन रखने का पात्र तुम्हारा बाम हस्त ही है । ऐसे महापुरुष बांये हाथ में भोजन रखते हुए दांये हाथ से उसे खाते हैं । हमारे श्यामसुन्दर इस बाललीला में करपात्री स्वामी बने हुए हैं । ( शेष सखा करपात्री स्वामी से निम्न स्थिति में हैं । वे लोग अपने भोजन का पात्र वाम हस्त को नहीं अपितु वृक्षों के पत्ते आदि को बनाये हैं ।) 
       
      इसे और सुस्पष्ट करने के लिए प्रभु के सखाओं के भोजन का पात्र भी देख लीजिए । पहले उन लोगों में भी किसी ने अपना भोजन पत्तों में तो कोई पुष्पों में , कोई पल्लवों में , कोई अंकुशों में तो कोई फलों में, एवं कोई छींकों में तो कोई छाल में तथा कुछ सखा पत्थरों को ही पात्र बनाकर भोजन रखे हुए हैं–
       
      केचित् पुष्पैर्दलै: केचित् पल्लवैरङ्कुरै: फलै: । शिग्भिस्त्वग्भिर्दृषद्भिश्च बुभुजु: कृतभाजना: ..
      भागवतमहापुराण,१०/१३/९,
      और वे सब भोजन कर रहे हैं । अब सुस्पष्ट हो गया कि “वामे पाणौ मसृणकवलं” से  केवल वाम हस्त में भोजन रखने में ही तात्पर्य है । और बिभ्रद् का सम्बन्ध इसे प्रमाणों कर रहा है । 
       
      जय श्रीराम
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
       
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      रुद्राष्टकम् के चमत्कारी प्रयोग

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       रुद्राष्टकम् शिव shiv

      यदि ग्रहण में रुद्राष्टक सिद्ध कर लिया जाय तो इसका प्रभाव तत्काल देखने को मिलता है ।

      ग्रहण शुरु होने के पहले स्नान करके आसन पर बैठ जायें । ग्रहण लगते ही पाठ आरम्भ कर दें । और ग्रहण समाप्ति तक पाठ करें । इससे रुद्राष्टक सिद्ध हो जायेगा ।

      १–कन्या के विवाह हेतु –

      जिन लड़कियों की शादी होने में विलम्ब हो रहा हो । उन्हें रुद्राष्टक से भगवान् भोलेनाथ की उपासना करनी चाहिए । शुक्लपक्ष के किसी भी सोमवार को मन्दिर में शिव जी को जल से स्नान करायें और ११ बिल्वपत्र चढ़ाकर गोघृत का दीपक लगाकर शिव जी के दांये सामने की ओर रखें । तत्पश्चात् रुद्राष्टक का ११ पाठ करें । विवाह निश्चित हो जाने पर भी बीच में न छोड़ें । विवाहोपरान्त ११विप्रों को भोजन एवं दक्षिणा दें । मासिक धर्म होने पर ये कार्य किसी अन्य से करवा लेना चाहिए ।

       

      १- १ लोटा ताम्रपत्र में जल

      २- ११ बिल्वपत्र

      ३- गोघृत का दीपक

      तत्पश्चात् पाठ आरम्भ करें । ११ पाठ प्रत्येक सोमवार को  करना है । किसी सोमवार को छूटने पर नियम खण्डित हो जायेगा । mc पीरियड में किसी महिला से करवा लें ।

       

                                                रुद्राष्टकम् 

       

      नमामीशमीशान निर्वाणरूपम् । विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ॥

      निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहम् । चिदाकाशमाकाशवासं भजेSहम् ॥१॥

      निराकारमोंकारमूलं तुरीयम् । गिरा ज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ॥

      करालं महाकालकालं कृपालम् । गुणागारसंसारपारं नतोSहम् ॥२॥

      तुषाराद्रि संकाशगौरं गभीरम् । मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् ॥

      स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारु गङ्गा । लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥

      चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालम् । प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ॥

      मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालम् । प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥

      प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशम् । अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ॥

      त्रय:शूलनिर्मूलनं शूलपाणिम् । भजेSहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥

      कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सच्चिदानन्ददाता पुरारी ।

      चिदानन्दसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥

      न यावद् उमानाथपादारविन्दम् । भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ॥

      न तावत् सुखं शान्तिसन्तापनाशम् । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥७॥

      न जानामि योगं जपं नैव पूजाम् ।नतोSहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ॥

      जरा  जन्मदु:खौघ  तातप्यमानम् । प्रभो पाहि  आपन्नमामीश  शंभो ॥८॥

      रुद्राष्टकमिदं    प्रोक्तं    विप्रेण    हरतोषये ।

      ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भु: प्रसीदति ॥

       

      –रामचरितमानस,उत्तरकाण्ड, १०८,

       

      २–शत्रु से मुक्ति हेतु –

      सारी सामग्री वही रहेगी । केवल दीपक सरसों के तेल का बायें सामने की ओर रखा जायेगा ।और रुद्राष्टक का पाठ रविवार से शुरु किया जायेगा । प्रतिदिन ११पाठ करके सोमवार को समापन करना है । यदि शत्रु की बाधा शेष हो तो अग्रिम सोमवार तक पाठ करें । बाद में शिव जी का रुद्राष्टक से दुग्धाभिषेक करके स्नान करवाये और पुये का भोग लगाकर प्रसाद वितरण करें ।

       

      ३–कर्ज से मुक्ति हेतु –

      ध्यानम्–

       

       शशांकशेषरं शम्भुं वरदं करुणाकरम् । ध्यात्वा शुद्धवपुर्धीमान् रुद्रं रुद्राष्टकं जपेत् ॥

       

      स्नाननादि से शुद्ध होकर बुद्धिमान् प्राणी वरमुद्राधारी करुणासिन्धु भगवान् चन्द्रशेषर का ध्यान करते हुए ११बार रुद्राष्टक का जप करे । आरम्भ चन्द्रवार ( मंडे ) से करना चाहिए । सामग्री कन्या विवाह वाली ही रहेगी । यह प्रयोग सोमवार से शुरु होकर प्रतिदिन करना चाहिए ।प्रत्येक सोमवार को भी कर सकते हैं ।

      जिन महानुभावों को सामग्री मिलना असम्भव हो वे मानस पूजा में वही सामग्री समर्पित करके लाभ ले सकते हैं ।

      – #आचार्यसियारामदासनैयायिक

       

       

       

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      “हनुमज्जयन्ती शब्द हनुमज्जन्मोत्सव की अपेक्षा विलक्षणरहस्यगर्भित है “

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      आज हनुमज्जयन्ती महोत्सव है । आजकल वाट्सएप्प से ज्ञानवितरण करने वाले एक मूर्खतापूर्ण सन्देश सर्वत्र प्रेषित कर रहे हैं कि हनुमज्यन्ती न कहकर इसे हनुमज्जन्मोत्सव कहना चाहिए ; क्योंकि जयन्ती मृतकों की मनायी जाती है । यह मात्र भ्रान्ति ही है ।

      हनुमज्जयन्ती शब्द का औचित्य पहले जयन्ती का अर्थ प्रस्तुत किया जाता है –

       जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः –स्कन्दमहापुराण,तिथ्यादितत्त्व,

       जो जय और पुण्य प्रदान करे उसे जयन्ती कहते हैं । कृष्णजन्माष्टमी से भारत का प्रत्येक प्राणी परिचित है । इसे कृष्णजन्मोत्सव भी कहते हैं । किन्तु जब यही अष्टमी अर्धरात्रि में पहले या बाद में रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो जाती है तब इसकी संज्ञा “कृष्णजयन्ती” हो जाती है –

       रोहिणीसहिता कृष्णा मासे च श्रावणेSष्टमी ।अर्द्धरात्रादधश्चोर्ध्वं कलयापि यदा भवेत् ।

      जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी ।।

       और इस जयन्ती व्रत का महत्त्व कृष्णजन्माष्टमी अर्थात् रोहिणीरहित कृष्णजन्माष्टमी से अधिक शास्त्रसिद्ध है । इससे यह सिद्ध हो गया कि जयन्ती जन्मोत्सव ही है । अन्तर इतना है कि योगविशेष में जन्मोत्सव की संज्ञा जयन्ती हो जाती है । यदि रोहिणी का योग न हो तो जन्माष्टमी की संज्ञा जयन्ती नहीं हो सकती–

       चन्द्रोदयेSष्टमी पूर्वा न रोहिणी भवेद् यदि ।

      तदा जन्माष्टमी सा च न जयन्तीति कथ्यते ॥–नारदीयसंहिता

       कहीं भी किसी मृत व्यक्ति के मरणोपरान्त उसकी जयन्ती नहीं अपितु पुण्यतिथि मनायी जाती है । भगवान् की लीला का संवरण होता है । मृत्यु या जन्म सामान्य प्राणी का होता है । भगवान् और उनकी नित्य विभूतियाँ अवतरित होती हैं । और उनको मनाने से प्रचुर पुण्य का समुदय होने के साथ ही पापमूलक विध्नों किम्वा नकारात्मक ऊर्जा का संक्षय होता है । इसलिए हनुमज्जयन्ती नाम शास्त्रप्रमाणानुमोदित ही है –

       ”जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः” –स्कन्दमहापुराण, तिथ्यादितत्त्व

       जैसे कृष्णजन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र का योग होने से उसकी महत्ता मात्र रोहिणीविरहित अष्टमी से बढ़ जाती है । और उसकी संज्ञा जयन्ती हो जाती है । ठीक वैसे ही कार्तिक मास में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी से स्वाती नक्षत्र तथा चैत्र मास में पूर्णिमा से चित्रा नक्षत्र का योग होने से कल्पभेदेन हनुमज्जन्मोत्सव की संज्ञा ” हनुमज्जयन्ती”  होने में क्या सन्देह है ??

       एकादशरुद्रस्वरूप भगवान् शिव ही हनुमान् जी महाराज के रूप में भगवान् विष्णु की सहायता के लिए  चैत्रमास की चित्रा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा को अवतीर्ण हुए हैं –

       ” यो वै चैकादशो रुद्रो हनुमान् स महाकपिः। अवतीर्ण: सहायार्थं विष्णोरमिततेजस: ॥

      –स्कन्दमहापुराण,माहेश्वर खण्डान्तर्गत, केदारखण्ड-८/१००

       पूर्णिमाख्ये तिथौ पुण्ये चित्रानक्षत्रसंयुते ॥

       चैत्र में हनुमज्जयन्ती मनाने की विशेष परम्परा दक्षिण भारत में प्रचलित है । 

       इसलिए वाट्सएप्प में कोपी पेस्ट करने वालों गुरुजनों के चरणों में बैठकर कुछ शास्त्र का भी अध्ययन करो  । वाट्सएप्प या गूगल से नहीं अपितु किसी गुरु के सान्निध्य से तत्त्वों का निर्णय करो ।

       —#आचार्यसियारामदासनैयायिक

       

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      श्रीमद्भगवद्गीता, द्वितीय अध्याय,श्लोक-४ की व्याख्या

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      हनुमान् जी

       
      अर्जुन उवाच
       
      कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥४॥
       
      व्याख्या  - पूर्व में अर्जुन ने कहा था कि इस युद्ध में स्वजनों के वध से हमें नरक की प्राप्ति होगी; क्योंकि हमें इनके वध से पाप लगेगा—“पापमेवाश्रयेदस्मान्—“१/३६, मधुसूदन ! हम शोक या मोह के वशीभूत होकर युद्धरूपी स्वधर्म का त्याग नहीं कर रहे हैं अपितु पाप के भय से हम युद्ध नहीं करना चाहते । इसी तथ्य का निरूपण स्वयं पार्थ द्वारा किया जा रहा हैं—कथमित्यादि पदकदम्बों से ।
      भीष्मं= पितामह भीष्म, और ,द्रोणं=आचार्य द्रोण को, संख्ये= युद्ध में, इषुभि:= बाणों से, कथं= कैसे, प्रतियोत्स्यामि= मारूंगा ? अर्थात् किसी भी प्रकार मैं उन्हें नहीं मार सकता ।क्यों ? क्योंकि वे दोनों, पूजार्हौ= पुष्पादि से पूजा के योग्य हैं न कि भयंकर बाणों से वध के योग्य । मधुसुदन= मधु जैसे दुष्ट दैत्य के निहन्ता ! अर्जुन मधुसूदन सम्बोधन से यह ध्वनित कर रहे हैं कि आप दुष्टदैत्यों के प्राणहर्ता हैं ।ऐसे आप मुझे पूज्यों के वध में क्यों प्रेरित कर रहे हैं ?
       
      मधुसूदन और अरिसूदन इन दो सम्बोधनों का प्रयोग प्रभु के लिए पार्थ द्वारा हुआ है । मधुसूदन सरस्वतीपाद कहते हैं कि शोकाकुल अर्जुन को पूर्वापर के परामर्श का वैकल्य होने से ऐसा हुआ है ।शोक से व्याकुल पुरुष को ्यान नहीं रहता इसलिए वह ऐसा कह देता है । फलत:  यह पुनरुक्त दोष नहीं है ।
       
      विचार करें तो मधुसूदन सम्बोधन द्रोणं च के साथ सम्बद्ध है और अरिसूदन पूजार्हौ के साथ । अर्जुन मधुसूदन सम्बोधन से यह कहना चाहते हैं कि आप देव हैं और आपने विजातीय दुष्ट मधु दैत्य का वध किया है । किन्तु मुझे अपने सजातीय सज्जन  पितामह भीष्म और उनके भी पूज्य आचार्य द्रोण का वध करने को कह रहे हैं ।
       
      पूजार्हौ अरिसूदन । शत्रुओं का विनाश करने वाले ! इसका  पूजार्हौ के साथ  सम्बन्ध है । आप रिपुओं का नाश करते हैं और मुझे पूजा करने योग्य अर्थात् शत्रुभाव से विनिर्मुक्त महापुरुषों के विध्वंस हेतु प्रेरित कर रहे हैं । क्या यह उचित है ??
       
      इसलिए पार्थ के द्वारा प्रयुक्त सम्बोधनद्वय विलक्षण भाव को प्रस्तुत करने से सार्थक हैं । फलत: पौनरुक्त्य नहीं ।
       
      पूजार्हौ । वे दोनों पूजा के योग्य हैं ।  अपूज्य की पूजा और पूज्य की अपूजा  दोनों ही अधर्म है । पूज्य की पूजा तथा अपूज्य की अपूजा ये दोनों धर्म हैं । जैसे पूज्य की पूजा विहित होने से धर्म है वैसे ही उनके साथ युद्ध करना महा अधर्म है । यदि कहें कि पूज्यों के साथ युद्ध निषिद्ध न होने से अधर्म नहीं है तो इसका उत्तर सुनें —
       
      गुरुं हुंकृत्य त्वंकृत्य विप्रं निर्जित्य वादत: । श्मशाने जायते वृक्ष: कंकगृद्धोपसेवित:॥
       
      गुरु को हुंकार अथवा त्वम् तुम इस प्रकार अपमानसूचक शब्दों से बोलने वाला तथा ब्राह्मण को वाद  में जीतता है । वह श्मशान में कौआ और गीध से सेवित वृक्ष बनता है । ( यद्यपि वाद उस वार्तालाप को कहते हैं जिसे तत्त्व को जानने की इच्छा से आरम्भ किया जाता है—“ तत्त्वबुभुत्सो: कथा वाद:” । अतएव  श्रेष्ठ होने से  इसे भगवान् ने गीता में “वादः प्रवदतामहम्॥” से  अपनी विभूति में परिगणित किया  ।तथापि  मध्य में विजिगीषा से यदि प्रश्न आदि करके विप्र पर विजय पायी जाय तो जीतने वाला नरकतुल्य कष्ट अवश्य भोगता है । अथवा  कुछ लोगों ने वाद के दो भेद स्वीकार किया है । प्रथम जल्प, द्वितीय वितण्डा । जैसे— तत्र वादो नाम य: परस्परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कतयति । स वादो द्विविध:संग्रहेण जल्पो वितण्डा च . तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्प: । जल्पविपर्ययो वितण्डा ॥-इति चरके विमानस्थानेSष्टमेSध्याये ) 
       
      प्रत्येक स्थिति में जीतने की इच्छा से चलने वाला वार्तालाप तत्त्वनिरूपणफलक न होकर परप्रतिष्ठा का विघातक होने से निक़ृष्ट फल नरकादि देने वाला है ।  वस्तुत: “उद्यते कथ्यते छलपूर्वकमसौ अशास्त्रीय: पक्ष: 
      इति वाद: । इस प्रकार यौगिक व्युत्पत्ति से छलपूर्वक असत् पक्ष का कथन यहां वाद पद से अभीष्ट है । अन्यथा शास्त्ररक्षा एवं वैदिक सनातन धर्म की सुरक्षा हेतु नास्तिक ब्राह्मणको पराजित करने पर भी  नरकादि की प्रसक्ति होगी । अशास्त्रीय पक्ष का प्रतिपादन शास्त्रीय पक्ष का खण्डन ये दोनों विप्र के लिए निरयप्रद हैं ।
      जब गुरु के प्रति हुंकार और त्वंकार जैसे शब्दप्रयोग नरकप्रद होते हैं तब साक्षात् वज्रवत् बाणों का प्रयोग निरयप्रद क्यों नहीं होगा ?? अत एव मैं इनके साथ अधर्मात्मक युद्ध नहीं कर सकता ।
       
      —जय श्रीराम—
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
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    • श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय द्वितीय श्लोक की व्याख्या

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      श्रीभगवानुवाच

       कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥

       व्याख्या—अर्जुन के मोह का विद्रावक वचन श्रीभगवान् आरम्भ कर रहे हैं । श्रीभगवान्= श्री आदरसूचक है । समग्र ऐश्वर्य , धर्म ,यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य -इन छहो गुणों का नाम भग है ।ये छहों जिनमें सर्वदा रहते हैं । उन्हें भगवान् कहते हैं । 

       ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशस: श्रिय: । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङगना  ॥—विष्णुपुराण-६/७४,

       इसीलिए पार्थ को ऐश्वर्य, धर्म, यश आदि प्राप्त कराने की इच्छा से भगवान् कहते हैं । 

       हे अर्जुन= पार्थ ! त्वा = तुमको इदं = यह,  कश्मलं= अपने वर्णाश्रमधर्म से पराङ्मुखतारूपी मलिन विचार ( मैं अहिंसा रूपी परम धर्म का पालन करूंगा और भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करूंगा पर युद्ध नहीं करूंगा ), कुत: = कहां से, विषमे= इस अनुपयुक्त स्थल में, समुपस्थितम्= प्राप्त हुआ ? यह, अनार्यजुष्टं= अनार्यों से सेवित अर्थात् आर्यों= शिष्टपुरुषों से त्याज्य है । वेदप्रामाण्य को मानते हुए जो वेदोक्त कर्मों का अनुष्टान करते हैं उन्हें शिष्ट कहा जाता है । धर्म वेदविहित है और अधर्म त्याज्य है । अत: पार्थ ! तुम्हारी यह धर्मपराङ्मुखता मात्र अधर्म है ।यदि तुम मोक्ष की इच्छा से स्ववर्णाश्रमधर्म का त्याग कर रहे हो तो तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता ; क्योंकि धर्म का पालन करने से स्वान्त की शुद्धि होकर भगवत्प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा होती है जिससे मोक्ष प्राप्त होता है । अत: तुम्हारे सदृश मुमक्षुओं को अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए । 

       ध्यातव्य है कि यदि जाति कर्मणा होती तो अर्जुन पर भगवान् मधुसूदन अनार्यजुष्ट शब्द से आक्षेप नहीं करते । और पार्थ माधव की बात भी नहीं मानते । कह देते कि अहिंसा और भिक्षावृत्ति ब्राह्मण का धर्म हैं । मैं उसे स्वीकार करूंगा तब ब्राह्णण हो जाउंगा । किन्तु अर्जुन का ऐसा न कहना सिद्ध करता है कि जाति कर्मणा नहीं अपित् जन्मना ही होती है ।अग्रिम “ स्वधर्मे निधनं श्रेय: —“ से भी यही बात सिद्ध होती है । कर्मणा जाति मानने पर जो कर्म करेंगे उसी के आधार पर जाति सिद्ध होगी फिर वह परधर्म कैसे होगा । यह तो तभी सम्भव है जब हम जाति को जन्मना स्वीकार करें ।अस्तु ।

       अस्वर्ग्यं= स्वर्गविरोधी नरक को प्राप्त कराने वाला, यहां नञर्थ असुर: की भांति विरुद्ध अर्थ में है । अत: स्वर्ग की इच्छा से भी तुम्हें अपने वर्णाश्रमधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए । अहिंसा और भिक्षावृत्ति तुम्हें नरक ले जायेगी । अकीर्तिकरम्= अपकीर्तिकारक, यह धर्मत्याग और परधर्म का सेवन तुम्हारी अपकीर्ति का जनक होगा । अत: चाहे मोक्ष की इच्छा हो या स्वर्ग अथवा कीर्ति की । इसके लिए तुम्हें यह विषाद और अहिंसा को परम धर्म समझना तथा भिक्षा वृत्ति से जीवन निर्वाह की इच्छा इन सबका त्याग करना ही पड़ेगा । इन सबको भगवान् आगे क्लैब्य शब्द से कहेंगे । 

       आज हिन्दुओं को जो अहिंसा का पाठ पढाने के साथ सहनशीलता सिखायी जाती है ।और भिक्षावृत्ति बनाम जीती हुई जमीन दुष्टों को लौटायी गयी या लौटायी जाती है । उसी का परिणाम है देश में आतंकवाद और नापाक देश की सीमा पर काली करतूतें तथा विदेशी बर्बर मुश्लिमों को शरणार्थी मानना ।

       गीता के द्वारा यही सन्देश दिया जा रहा है कि वर्तमान परिस्थिति में दुष्टों का दलन, उनकी भूमि पर धर्मपूर्वक प्रजापालन और लुटेरे मुश्लिमों का निष्कासन यही राष्ट्रधर्म है । जो देशद्रोह करे वह प्रजा नहीं ।

       —#आचार्यसियारामदासनैयायिक

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      गीतागङ्गा महानदी

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      भगवद्गीताम 

      मुरघ्नगिरिसम्भूता अनन्ताम्बुधिगामिनी  । पावयत्यखिलान् लोकान्  गीतागंगा महानदी ।।

       

      पंचशिर मुर ( पंचपर्वा अविद्याख्यापरपर्याय अज्ञान ) के विनाशक भगवान् वासुदेव रूपी अद्रि से समुद्भूत 

      “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्याद्याकारक श्रुतिसमुद्घोषित अविनाशी ब्रह्मस्वरूप सागरगामिनी  गीतागंगारूपिणी

      महानदी समस्त लोकों को पवित्र कर रही हैं ।

      —#आचार्यसियारामदासनैयायिक

       

       

       

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    • रामपालमोहविद्रावण अनुत्तम-शब्द-विमर्श

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      भगवद्गीता के सातवें अध्याय के १८ वें श्लोक में रामपाल नामक एक महाशय “अनुत्तमां गतिम् ।।” में आये अनुत्तम (अनुत्तमां के पुल्लिंग अनुत्तम शब्द पर ) विचार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि यहां अनुत्तम का अर्थ सर्वश्रेष्ठ नहीं है । ऐसा अर्थ अज्ञानी अनाड़ी करते हैं । स्वामी निश्चलानन्द जी महाराज से एक सज्जन पूछते हैं कि उत्तम और अनुत्तम में क्या अन्तर है ?

       
      प्रष्टा महानुभाव सुन लें । दोनों शब्दों का अर्थ है श्रेष्ठ । हम पहले इसे सप्रमाण पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं –
       
      अनुत्तम: – त्रि, ( नास्ति उत्तम: उत्कृष्ट: यस्मात् ) =जिससे उत्कृष्ट कोई न हो अर्थात् सर्वश्रेष्ठ ।-शब्दकल्पद्रुम ।
       
      अमरकोष में–
      “क्लीबे प्रधानं प्रमुखं प्रवेकानुत्तमोत्मा: .”-३/१/५७,  प्रधान, प्रमुख अनु्त्तम और उत्तम शब्द पर्यायवाचीरूप में पठित हैं । अनुत्तम का अर्थ है सर्वश्रेष्ठ , ” नोत्तमो यस्मात् , अतिशयेनोत्कृष्ट: । जिससे उत्तम दूसरा न हो । यह अर्थ कोई ब्राह्मण या पण्डित कर रहा है -ऐसा रामपाल जी या उनके अनुयायी नहीं कह सकते । यह कोष तो अमरसिंह की छठीं शती के आस पास की रचना है ।
       
      अब प्राचीन शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ अर्थ में अनुत्तम शब्द कहां आया है ? -इसे हम सप्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं –
      मनुस्मृति में –
       
      ” श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानव: .
      इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ।।- २/९,
       
      यहां कुल्लूक भट्ट ने मन्वर्थमुक्तावली में अनुत्तम का अर्थ उत्कृष्ट किया है ।-उत्कृष्टं स्वर्गापवर्गादिसुखरूपं । यह श्रुति स्मृति के द्वारा कहे गये धर्म का फल है जो उत्कृष्ट कहा गया है । 
       
       रामपाल जी !   यदि आप कहे कि हमें मनुस्मृति की बात अच्छी ही नहीं लगती है । तब हम आपको ऐसा प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे आज समग्र विश्व मान रहा है –”योग”.
       
      अब आपके समक्ष योगदर्शन का सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं –
       
      सन्तोषादनुत्तमसुखलाभ:”–साधनपाद-४२वां सूत्र ,
       
       सन्तोष से अनुत्तम= सर्वोत्कृष्ट सुख, का लाभ होता है । इस पातञ्जल सूत्र में अनुत्तम का अर्थ सर्वोत्कृष्ट व्यासभाष्यकार, वाचस्पति मिश्र प्रभृति सभी विद्वानों ने किया है । सन्त होकर आप पातञ्जल सूत्र को नजरन्दाज नहीं कर सकते । इस अनुत्तम शब्द का घटिया अर्थ तो आप भी नहीं कर सकते हैं । ऐसा नहीं कह सकते  कि “सन्तोष से घटिया सुख मिलता है ।” यह तो आपको भी याद होगा–
       
      “गोधन गजधन बाजिधन और रतनधन खान ।
      जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समान ।।”
       
      गाय घोड़े आदि सब धूल के समान हैं जब सन्तोष धन आ गया   इन सबसे वो सुख नहीं मिलता जो सन्तोष से प्राप्त होता है । 
       
      हमने आपके समक्ष शास्त्रों के दो प्रमाण प्रस्तुत किया कि अनुत्तम का अर्थ सर्वोत्कृष्ट होता है  । इसलिए भगवद्गीता में अनुत्तमां गतिम् ” में अनुत्तम का अर्थ सर्वोत्कृष्ट है । 
       
      रामपाल जी एवम् उनके अनुयायियों ! अनुत्तम शब्द सर्वोत्कृष्ट अर्थ का वाचक है -इसमें हमने प्राचीन ग्रन्थ अमरकोष, मनुस्मृति और पातञ्जल योगदर्शन जैसे ग्रन्थों को प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया । अब गीता के अर्थ को दूषित करने का दुस्साहस मत करो । संस्कृतभाषा की गन्ध नहीं और रामपाल चले हैं गीता पर बोलने । 
       
      यदि वामन आप्टे कोष से कुछ ऊपर उठ सके तो हमारी बात अनुयायियों सहित आपको समझ में आ जायेगी । 
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
       
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      संध्या और ब्रह्मगायत्री जप की संख्या का सप्रमाणविवेचन

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      Narsingh or prahlad hiranya kashyap

      स्नान करने के पश्चात् द्विज को समयानुसार संध्या में प्रवृत्त होना चाहिए । सन्ध्या नित्य कर्म है । यदि समय स्वल्प हो तो संक्षेप में भी सन्ध्या कर लेनी चाहिए । सन्ध्या के मन्त्रों में प्राणायाम से नाड़ीशोधन होता है । मार्जन से शरीरशुद्धि और  -सूर्यश्च इत्यादि मन्त्रों से आचमन करने पर रात्रिकृत पापों का नाश होता है । द्रुपदादिव-मन्त्र  एवं अघमर्षण मन्त्र से पापों का विध्वंस होता है । 
       
      इसीलिए मनीषीजन कहते हैं कि सन्ध्या न करने पर पाप लगता है; क्योंकि रात्रिकृत दुष्कृत नष्ट नहीं हुआ । और करने पर पुण्य नहीं होता है ; क्योंकि स्वर्गादि की भांति किसी फलविशेष के लिए सन्ध्या कर्म का विधान नहीं है ।
       
      नित्य कर्म में कुछ अंग यदि समय न होने से छूट भी  जांय तो कोई हानि नहीं है; क्योंकि सूर्यशच् इत्यादि मन्त्र से किया जाने वाला पापप्रणाश द्रुपदादिव मन्त्र से हो जाता है । सूर्यश्च–, तथा द्रुपदादिव ये दोनों मन्त्र पापक्षालक हैं । किन्तु यही कार्य अघमर्षण मन्त्र से भी होता है । अघमर्षण तान्त्रिक सन्ध्या में विशेष बतलाया गया है ।
       
      सन्ध्या अनिवार्य है । द्विज मात्र को प्राणायाम अघमर्षण सूर्यार्घ्य तथा गायत्री जप ये सब प्रतिदिन करना चाहिए ।
       
      गायत्री जप की संख्या 
       
      साधक को प्रतिदिन समय को देखकर जपसंख्या निर्धारित करनी चाहिए ।  जो वैष्णवादि मन्त्रों से दीक्षित नहीं हैं । वे नित्य १००० संख्या में गायत्री जप करें । कम समय हो तो १००  जप और अतिस्वल्प समय वालों को १० की संख्या  में गायत्री जप अनिवार्य है ।–
       
      सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां शतावराम् । गायत्रीं यो जपेन्नित्यं न स पापैर्हि लिप्यते ।।
      – नरसिहंपुराण, अध्याय ५८/८६
       
      इस प्रकार जापक पापों से लिप्त नहीं होता है । 
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
       

       

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      सप्रमाण सविधि अनन्तचतुर्दशी ( अनन्तव्रत ) व्रत और पौराणिक कथा

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      नारायणकवचम्

      अनन्तस्य -अनन्तसंज्ञकभगवतो विष्णो: चतुर्दशीव्रतमिति =अनन्तचतुर्दशीव्रतम् । अनन्त अर्थात् सर्वव्यापक परमात्मा भगवान् विष्णु का चतुर्दशी तिथि को किया जाने वाला व्रत । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म – श्रुति में अनन्तपद से इन्हीं भगवान् का संकेत है । 

      इसकी चर्चा भविष्योत्तर तथा तिथ्यादितत्त्व ग्रन्थों में आयी है । यह व्रत सभी नर नारियों के पापों का संहारक तथा सकल कामनाओं का पूरक है । - 
       
      अनन्तव्रतमेतद्धि सर्वपापहरं शुभम् । सर्वकामप्रदं नृणां स्त्रीणां चैव युधिष्ठिर ।।
       
      यह व्रत भाद्रपद मास ( भादंव ) के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है । इसमें भगवान् विष्णु की कुश की प्रतिमा बनाकर उसे जल या किसी धान्य पदार्थ में रखकर गन्ध,पुष्प,फल, नैवेद्य आदि से पूजन करना चाहिए ।
       
      पूजन में १४ कमल पुष्प, ( अभाव में अन्य पुष्प भी ले सकते हैं ) १४ फल, तथा दक्षिणा भी १४ की संख्या में होनी चाहिए । यह व्रत १४ वर्षों तक का संकल्प लेकर किया जाता है । असामर्थ्य में जो भी उपलब्ध हो । उसी का सश्रद्धया समर्पण भगवान् के अनुग्रह को प्राप्त कराता है । 
       
      भोग- जौ गेहूं या चावल के आंटे में कोई भी एक हो उसका घृत में २ पुआ बनाकर  भगवान् को भोग लगाये और एक पुआ प्रसाद रूप में स्वयं ग्रहण कर ले । परिवार के अनेक सदस्य यदि इस व्रत को कर रहे हों तो सामर्थ्य के अनुसार 
      २-२ पुए अधिक बनायें । ५ लोगों से भगवान् की पूजा करवानी हो तो १० पुये चाहिए । सामर्थ्य न हो तो एक पुये में ही बांटकर प्रसाद लिया जा सकता है ।
       
      डोरा- कुमकुम से रंगे हुए १४ सूत्र वाले कपास से बने डोरे में भगवान् के नाम का उच्चारण करते हुए १४ गांठें लगानी चाहिए । और निम्नलिखित मन्त्र से पूजन करते हुए उसे पुरुष को दांये तथा स्त्री को बांये हाथ में बांधकर तत्पश्चात् 
      भगवान् के पुये प्रसाद को ग्रहण करना चाहिए ।
       
      डोरा बांधने का मन्त्र- 
       
      अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव । 
      अनन्तरूपिन् विनियोजयस्व अनन्तरूपाय नमो नमस्ते ।।
      ओम् इदं डोरमनन्ताख्यं चतुर्दशगुणात्मकम् । सर्वदेवमयं विष्णो! स्वकरे धारयाम्यहम् ।।
       
      अनन्तचतुर्दशीव्रत की कथा 
      धर्मराज युधिष्ठिर जब वनवास कर रहे थे उस समय उनसे मिलने भगवान् कृष्ण पहुंचे । पाण्डुनन्दन ने वार्तालाप के मध्य प्रशन किया कि हे प्रभो! किस व्रत के अनुष्ठान से सम्पूर्ण प्राणी निष्पाप होकर अपने मनोवांछित फल को प्राप्त कर सकते हैं ।
       
      मधुसूदन ने कहा कि देवराज इन्द्रादि से पूर्व में अनन्त नामक व्रत किया गया है । ( देहात में इसे ” अनन्ता” कहते हैं । 
      ) इससे सम्पूर्ण पापों का प्रणाश तथा मनोSभिलषित पदार्थों की प्राप्ति होती है ।
      युधिष्ठिर जी ने पूंछा कि यह अनन्त कौन हैं ? यह शेष नाग या अनन्त नामक नाग किम्वा तक्षक है ? क्योंकि शास्त्रों में इन सबको अनन्त शब्द से कहा गया है । अथवा अनन्त ब्रह्म को कहा गया है ?-
       
      उताहो ब्रह्म उच्यते । क एषोSनन्तसंज्ञो वै तन्मे ब्रूहि जनार्दन !
       
      भगवान् कृष्ण ने उत्तर देते हुए कहा कि अनन्त मुझ परमात्मा को ही कहा गया है । अनन्त का अर्थ बड़ा व्यापक है । हरि शिव विष्णु, सूर्य ,ब्राह्मण, शेषनाग के साथ सर्वव्यापक ईश्वर का वाचक है “अनन्त” शब्द । तात्पर्य यह कि इस व्रत को करने से भगवान् विष्णु, शिव,शेषनाग एवं सूर्य आदि सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं । 
       
      युधुष्ठिर जी ने पूछा कि हे जनार्दन ! इस अनन्त व्रत के करने से जो पुण्य या फल होता है । या इसे करने की जो विधि है  और पहले जिन लोगों ने इसे किया है  । वह सब बतलाने की कृपा करें । 
       
      श्रीकृष्ण ने कहा कि पूर्वकाल सतयुग में वशिष्ठगोत्रोत्पन्न सुमन्तु नामक जितेन्द्रिय ब्राह्मण थे । उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था जो भृगुवंश की शील सदाचारसम्पन्न कन्या थी । सुमन्तु की पत्नी के गर्भ से सुन्दर शील युक्त एक कन्या जन्मी जिसका नाम रखा शीला । कुछ दिनों बाद ज्वर रोग से उनकी पत्नी दीक्षा का स्वर्गवास हो गया। उसके पारलौकिक कर्म को करके सुमन्तु ने विचार किया कि विना पत्नी के गृहस्थ धर्म का सम्पादन मैं कैसे करूंगा ?
       
      अत: उन्होने देवल मुनि की कर्कशा नामक कन्या से विवाह किया । ये बहुत दुष्ट और भोजनभट्ट थी । प्राय: दूसरा विवाह करने वाले सज्जन ऐसी ही पत्नी पाते हैं । अस्तु । इधर उनकी शीला कन्या यौवनावस्था में पहुंची तो उन्होंने कौण्डिन्य नामक कुलीन विप्र से उस
      का विवाह कर दिया । विवाह में दक्षिणा के लिए सुमन्तु ने पत्नी को पुकारा । वह दुष्टा कटु वचन बोलते हुए आयी और कुछ वस्तुए रखकर दूसरे के घर गप्प मारने चली गयी ।
       
      कन्या को विदा कराके कौण्डिन्य मार्ग में आ रहे थे । तो मध्याह्न भोजनवेला में वे नदीतट पर पहुंचे । जहां अनेक नर नारियां भादंव शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान् अनन्त की अर्चना कर रहे थे । शीला ने उन लोगों से पूंछा कि यह क्या है ? और इस पूजन का फल क्या है ? 
       
      उन लोगों ने कहा कि यह अनन्तव्रत है जो भाद्रपद की शुक्ल चतुर्दशी को किया जाता है । आज के दिन शंखचक्रधर भगवान् का आवाहन करके जौ या गेहूं अथवा चावल जो भी उपलब्ध हो उसके आंटे से घी में २ पुआ बनवाये  गन्ध,पुष्प आदि से प्रभु का पूजन करके पुओं का भोग लगाये । तत्पश्चात् एक पुआ विप्र के लिए देकर एक प्रसादरूप में ग्रहण कर ले । और विप्र से अनन्तव्रत की कथा सुने । पुन: कपास के १४ सूत्रों के डोरे को कुंकुम से रंग करके हरिनाम से उसमें १४ ग्रन्थियां लगवाये । पुन: इसका पूजन करके “अनन्तसंसार–” इत्यादि मन्त्रों से नारी बांये और पुरुष दांये हाथ में विप्र से बंधवा  ले । पुन: भगवान् का पूर्ववत् पूजन करवाकर अन्त में ब्राह्मण को भोजन के बाद  दक्षिणा आदि देकर विदा करे । इस प्रकार यह व्रत पूर्ण होता है । इससे समस्त पापों का प्रक्षालन तथा कामनाओं की सिद्धि होती है । 
       
      शीला ने भी वहीं नदीतट पर उस व्रत को सम्पन्न किया । और पुआप्रसादरूप में ग्रहणकर अनन्त भगवान् का डोरा बांधकर पति के घर पहुंची । इस व्रत के प्रभाव से उसका घर धन धान्य तथा अनेक रत्नों से पूर्ण हो गया । एक दिन वह यज्ञकुण्ड पर बैठे पति के समीप जाकर विराजमान हुई और पति कौण्डिन्य की दृष्टि उस डोरे पर पड़ते ही उन्होंने उसे खोलकर अग्नि में फेंकना चाहा । तब पत्नी शीला ने भगवान् अनन्त के व्रत के विषय में बतलाकर उन्हें रोंका । पर पतिने उसे आग में फेंक ही दिया । बेचारी शीला हाहाकार कर उठी और दौडकर उस डोरे को निकालकर पानी से बुझाकर पुन: पहन लिया ।
       
      अब कौण्डिन्य के इस अपराध का फल दरिद्रता के रूप में प्रकट हुआ । घर में आग लग गयी । सब कुछ स्वाहा हो गया । अब उनकी बुद्धि ठिकाने आयी । और वे अनन्त को जानने की इच्छा से घनघोर वन में गये । उन्होंने आम्रवृक्ष, धेनु, वृषभ, गर्दभ, हाथी तथा दो पुष्करिणियों से अनन्त के विषय में पूछा । पर कोई उत्तर न दे सका ।
       
      कौण्डिन्य अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए हाहाकार करके भूमि पर गिर पड़े । महान् पश्चात्ताप से व्याकुल होकर कहने लगे कि अब मैं कहां जाऊं ? क्या करूं ? कैसे उन अनन्त भगवान् को पाऊं ?
       
      सर्वज्ञ प्रभु  विप्र को अतिव्याकुल और पश्चात्ताप की अग्नि में जलता हुआ देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके आये और बोले कि आप दु: खी मत हों । मैं आपको अनन्त के विषय में बतलाऊंगा । ऐसा कहकर कौण्डिन्य को लेकर पाताल मार्ग से भगवान् अनन्त के पास पहुंचाकर अन्तर्धान हो गये । वहां कौण्डिन्य ने शंखचक्रधारी  चतुर्भुज भगवान को लक्ष्मी एवं सरस्वती जी के साथ देखा । वे भगवान् को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे । भगवान् ने प्रसन्न होकर उन्हें वर मांगने को कहा तब उस विप्रशिरोमणि ने प्रभु से उनकी अविरल भक्ति मांगी । कौण्डिन्य का जीवन धन्य हो गया ।
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
       
       
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