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      क्या भगवान् कृष्ण ने बालकों के साथ वांये हाथ से भोजन किया था ??

      क्या भगवान् कृष्ण ने बालकों के साथ वांये हाथ से भोजन किया था ?? आजकल  भागवत के श्लोकों का परम्परया अध्ययन न होने से लोग शास्त्रविरुद्ध अर्थ की कल्पना से अनेक भाव व्यक्त करते रहते हैं । भवाभिव्यक्ति प्रशंसनीय है । पर श्लोक का अर्थ तो पहले सही लगाया जाय । देखें—

       
      प्रसंग उस समय का है जब भगवान् श्यामसुन्दर वछड़ों को चराते हुए बालकों के मध्य भोजन कर रहे हैं । देखें–
       
      बिभ्रद्वेणुं जठरपटयो: शृंगवेत्रे च कक्षे वामे पाणौ मसृणकवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु ।
      तिष्ठति मध्ये स्वपरिसुहृदो हास्यन् नर्मभिक्या भगवान् कृष्ण ने बालकों के साथ वांये हाथ से भोजन किया था ??: स्वै: स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञभुग्बालकेलि: ..
      –भागवतमहापुराण, १०/१३/११,
       
      अर्थ- उन्होंने मुरली को कमर की फेंट में आगे की ओर खोस लिया था । सिंगी और बेंच बग़ल में दबा लिये थे । बांये हाथ में बड़ा ही मधुर घृतमिश्रित ग्रास था । और अंगुलियों में अदरक, नींबू आदि के अचार-मुरब्बे दबा रखे थे । ग्वालबाल उनको चारों ओर से घेरकर बैठे हुए थे और वे स्वयं सबके बीच बैठकर अपनी विनोदमयी बातों से अपने साथी ग्वालबालों को हँसाते जा रहे थे । जो समस्त यज्ञों के एकमात्र भोक्ता हैं , वे ही 
      भगवान् ग्वाल बालों के साथ बैठकर इस प्रकार बाललीला करते हुए भोजन कर रहे थे और स्वर्ग के देवता आश्चर्यचकित होकर यह अद्भुत लीला देख रहे थे ।
       
      रेखांकित पंक्तियों से यह स्पष्ट हो रहा है कि प्रभु बांये हाथ से भोजन कर रहे हैं । पर श्लोकार्थ पर विचार करें तो यह भ्रम दूर हो जायेगा । श्लोक में बिभ्रद् =धारण किये हुए, शब्द पर ध्यान देने से समाधान हो जाता है । श्रीशुकदेव जी यहाँ यह बतला रहे हैं कि भगवान् ने कौन वस्तु कहाँ धारण कर रखी है ?  भागवत के प्रख्यात टीकाकार श्रीश्रीधर स्वामी जी लिखते हैं कि ” बिभ्रद् दधदिति सर्वत्र सम्बध्यते ” बिभ्रद् का सम्बन्ध वेणु की भाँति शृंगवेत्रे तथा मसृणकवलं के साथ भी है । जिसका अर्थ है कि उदरवस्त्र के मध्य में वेणु को धारण किये हुए, वाम कक्ष (भाग) में शृंग और वेंत धारण किये हुए तथा वामे पाणौ= बांये हाथ में, मसृणकवलं = स्निग्ध = (चिक्कणं मसृणं स्निग्धमित्यमर: ) दधिघृतादिमिश्रित, कवलं= ग्रास को धारण किये हुए । 
       
      ध्यातव्य है कि भगवान् का दाहिना हाथ रिक्त है । क्योंकि उससे उन्हें भोजन जो करना है । बांये हाथ में केवल ग्रास ही नहीं अपितु उसकी अंगुलियों की संधियों में दध्योदन के उपयोगी अंचार आदि भी रखे हुए हैं — यह सुस्पष्ट किया गया है । अर्थात् भगवान् ने अपने भोजन का पात्र बांये हाथ को बनाया है । मानों परम वैराग्यवान् 
      करपात्री परमहंसों को भोजन करने की शिक्षा दे रहे हों कि तुम्हारे लिए भोजन रखने का पात्र तुम्हारा बाम हस्त ही है । ऐसे महापुरुष बांये हाथ में भोजन रखते हुए दांये हाथ से उसे खाते हैं । हमारे श्यामसुन्दर इस बाललीला में करपात्री स्वामी बने हुए हैं । ( शेष सखा करपात्री स्वामी से निम्न स्थिति में हैं । वे लोग अपने भोजन का पात्र वाम हस्त को नहीं अपितु वृक्षों के पत्ते आदि को बनाये हैं ।) 
       
      इसे और सुस्पष्ट करने के लिए प्रभु के सखाओं के भोजन का पात्र भी देख लीजिए । पहले उन लोगों में भी किसी ने अपना भोजन पत्तों में तो कोई पुष्पों में , कोई पल्लवों में , कोई अंकुशों में तो कोई फलों में, एवं कोई छींकों में तो कोई छाल में तथा कुछ सखा पत्थरों को ही पात्र बनाकर भोजन रखे हुए हैं–
       
      केचित् पुष्पैर्दलै: केचित् पल्लवैरङ्कुरै: फलै: । शिग्भिस्त्वग्भिर्दृषद्भिश्च बुभुजु: कृतभाजना: ..
      भागवतमहापुराण,१०/१३/९,
      और वे सब भोजन कर रहे हैं । अब सुस्पष्ट हो गया कि “वामे पाणौ मसृणकवलं” से  केवल वाम हस्त में भोजन रखने में ही तात्पर्य है । और बिभ्रद् का सम्बन्ध इसे प्रमाणों कर रहा है । 
       
      जय श्रीराम
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
       
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      नागकन्या द्वारा हनुमान् जी की उपासना

      Nagkanya bhaydhvansi hanuman

       

       
       
      हनुमत्सहस्रनाम में हनुमान् जी   का एक नाम आया है –”नागकन्याभयध्वंसी”=नागकन्या के भय को नष्ट करने वाले मारुति । इससे यह सिद्ध होता है कि नारियों को भी हनुमन्मन्त्र के जप में अधिकार है । पार्वती जी तथा अगस्त्यभार्या लोपामुद्रा जैसी महिलायें संहिता एवं तन्त्रग्रन्थों में हनुमदुपासिका के रूप में समुपवर्णित हैं ।
       
       
      किम्पुरुषवर्ष में गन्धर्व आर्ष्टिषेण जो हनुमान् जी को विविध प्रकार के संगीतमय रामचरित सुनाते हैं । उनके अनुज सुषेण प्रतिदिन सर्वोपचार से आञ्जनेय की पूजा करते थे । हनुमदाराधन से वे उठे ही थे कि उनके समीप नागलोक की साम्राज्ञी नागकन्या एक रक्तरोम नामक राक्षस से पीड़ित होकर अपनी मुक्तिहेतु पहुँची ।और प्रणाम करके बोली ।गन्धर्वप्रवर ! नागलोक में यक्ष किन्नर, गन्धर्व,सिद्ध, विद्याधर, सुर एवं राक्षसों से भी अपराजेय रक्तरोम नामक राक्षस आकर नागों को पीड़ित कर रहा है और मुझे देखकर कामबाणों से आक्रान्त वह राक्षस पकड़ने की चेष्टा करने लगा । 
       
      मैंने उसके कुभाव को देखा और भयाक्रान्त होकर आपकी शरण में आयी हूँ । आप हनुमान् जी के परम भक्त हैं ।
      मुझे उस दुष्ट राक्षस से मुक्ति का कोई उपाय बतलायें ।जिससे समग्र नागलोक के साथ मैं उस दुष्ट निशाचर से भयमुक्त हो जाऊँ ।
       
      सुषेण उसकी मन:स्थिति को देखकर द्रवीभूत हो गये और बोले – पुत्रि ! मैं तुम्हें हनुमान् जी का एक मन्त्र बतला रहा हूँ । उस मन्त्र के जप से तुम महाबली मारुति की कृपा प्राप्त करोगी और सर्वथा भयमुक्त हो जाओगी । ऐसा कहकर गन्धर्वश्रेष्ठ सुषेण ने उसे शुक्लसंज्ञक एक मन्त्र प्रदान किया–
       
      ” श्रीमन्निरन्तरकरुणामृतसारवर्षिणं, पिंगलाक्षं,—श्रीरामचन्द्रचरणारविन्दसन्धितहृदयारविन्दं-अखिलकल्याणगुणवन्तं श्रीहनुमन्तमुपास्महे ॥-परासरसंहिता, पटल-३२, मन्त्र -३२,
       
      इस मालामन्त्र के जपप्रभाव से केशरीनन्दन प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये । पवनात्मज ने उससे पूछा — पुत्रि! तुम क्या चाहती हो ?  नागकन्या ने रक्तरोम के महान् उपद्रवों से मुक्ति माँगी । हनुमान् जी किम्पुरुषवर्ष से नागकन्या के साथ नागलोक पहुँचे ।वहाँ उन्होंने रक्तरोम राक्षस के भीषण अत्याचारों को देखा । कपिवर ने पर्वताकार प्रचण्ड पराक्रमी उस राक्षस को युद्ध के लिए ललकारा । विलक्षण युद्ध करके उसे अपनी पूछ से बाँध लिया तथा  
      अपने प्रचण्ड भुजदण्डों से उसे पीस डाला । नागकन्या भयमुक्त हुई ।
       
      यक्ष, पन्नग, गन्धर्व और नारद जैसे देवर्षियों ने अञ्जनानन्दन की स्तुति की । हनुमान् जी ने उस नागकन्या को अभीष्ट वर देकर पुन: उसके पद पर उसे प्रतिष्ठित  कर दिया । और गन्धमादन पर्वत पर चले गये ।
       
      यह वृत्तान्त श्रीपरासर संहिता के बत्तीसवें पटल में उपवर्णित है ।
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
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      जीव की विपरीत मति

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      हनुमान जी, hanuman ji

      दारा: परिभवाकारा बन्धुजनो बन्धनं विषं विषया: .

      कोSयं जनस्य मोहो ये रिपवस्तेषु सुहृदाशा ।।

       

      अर्थ– पत्नी तिरस्कार रूप है अर्थात् परमार्थ पथ में समय समय पर विषयोन्मुख करके मानो तिरस्कार कर रही हो । बन्धुजन बन्धनस्वरूप हैं उनके प्रति राग होने से परमात्मा में अनुराग नहीं होता है ।और शब्द रूप आदि पाँच विषय ही विष हैं । विषभक्षण से एक जन्म ही नष्ट होता है पर विषयों का चिन्तन अनेक जन्म नष्ट कर देता है ।

       

      जीव का यह कैसा मोह है कि जो शत्रु हैं । उन्हीं में मित्र की आशा लगा बैठा है ।

       

      #आचार्यसियारामदासनैयायिक

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      योग का प्रथम द्वार

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      योग का प्रथम द्वार  योगस्य प्रथमं द्वारं वाङ्निरोधोSपरिग्रह: । निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता ।। --विवेकचूडामणि-३६८ वाणी का निरोध,अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न करना, किसी से आशा न रखना,विविध कामनाओं का त्याग और नित्य एकान्त में निवास --ये चार वस्तुयें आत्मचिन्तक के लिए सर्वप्रथम आवश्यक हैं ।--जय श्रीराम  #आचार्य सियारामदास नैयायिकयोगस्य प्रथमं द्वारं वाङ्निरोधोSपरिग्रह: । निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता ।।

      –विवेकचूडामणि-३६८


      वाणी का निरोध,अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न करना, किसी से आशा न रखना,

      विविध कामनाओं का त्याग और नित्य एकान्त में निवास –ये चार वस्तुयें आत्मचिन्तक

      के लिए सर्वप्रथम आवश्यक हैं ।

      –जय श्रीराम


      #आचार्य सियारामदास नैयायिक

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      रुद्राष्टकम् के चमत्कारी प्रयोग

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       रुद्राष्टकम् शिव shiv

      यदि ग्रहण में रुद्राष्टक सिद्ध कर लिया जाय तो इसका प्रभाव तत्काल देखने को मिलता है ।

      ग्रहण शुरु होने के पहले स्नान करके आसन पर बैठ जायें । ग्रहण लगते ही पाठ आरम्भ कर दें । और ग्रहण समाप्ति तक पाठ करें । इससे रुद्राष्टक सिद्ध हो जायेगा ।

      १–कन्या के विवाह हेतु –

      जिन लड़कियों की शादी होने में विलम्ब हो रहा हो । उन्हें रुद्राष्टक से भगवान् भोलेनाथ की उपासना करनी चाहिए । शुक्लपक्ष के किसी भी सोमवार को मन्दिर में शिव जी को जल से स्नान करायें और ११ बिल्वपत्र चढ़ाकर गोघृत का दीपक लगाकर शिव जी के दांये सामने की ओर रखें । तत्पश्चात् रुद्राष्टक का ११ पाठ करें । विवाह निश्चित हो जाने पर भी बीच में न छोड़ें । विवाहोपरान्त ११विप्रों को भोजन एवं दक्षिणा दें । मासिक धर्म होने पर ये कार्य किसी अन्य से करवा लेना चाहिए ।

       

      १- १ लोटा ताम्रपत्र में जल

      २- ११ बिल्वपत्र

      ३- गोघृत का दीपक

      तत्पश्चात् पाठ आरम्भ करें । ११ पाठ प्रत्येक सोमवार को  करना है । किसी सोमवार को छूटने पर नियम खण्डित हो जायेगा । mc पीरियड में किसी महिला से करवा लें ।

       

                                                रुद्राष्टकम् 

       

      नमामीशमीशान निर्वाणरूपम् । विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ॥

      निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहम् । चिदाकाशमाकाशवासं भजेSहम् ॥१॥

      निराकारमोंकारमूलं तुरीयम् । गिरा ज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ॥

      करालं महाकालकालं कृपालम् । गुणागारसंसारपारं नतोSहम् ॥२॥

      तुषाराद्रि संकाशगौरं गभीरम् । मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् ॥

      स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारु गङ्गा । लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥

      चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालम् । प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ॥

      मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालम् । प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥

      प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशम् । अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ॥

      त्रय:शूलनिर्मूलनं शूलपाणिम् । भजेSहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥

      कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सच्चिदानन्ददाता पुरारी ।

      चिदानन्दसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥

      न यावद् उमानाथपादारविन्दम् । भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ॥

      न तावत् सुखं शान्तिसन्तापनाशम् । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥७॥

      न जानामि योगं जपं नैव पूजाम् ।नतोSहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ॥

      जरा  जन्मदु:खौघ  तातप्यमानम् । प्रभो पाहि  आपन्नमामीश  शंभो ॥८॥

      रुद्राष्टकमिदं    प्रोक्तं    विप्रेण    हरतोषये ।

      ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भु: प्रसीदति ॥

       

      –रामचरितमानस,उत्तरकाण्ड, १०८,

       

      २–शत्रु से मुक्ति हेतु –

      सारी सामग्री वही रहेगी । केवल दीपक सरसों के तेल का बायें सामने की ओर रखा जायेगा ।और रुद्राष्टक का पाठ रविवार से शुरु किया जायेगा । प्रतिदिन ११पाठ करके सोमवार को समापन करना है । यदि शत्रु की बाधा शेष हो तो अग्रिम सोमवार तक पाठ करें । बाद में शिव जी का रुद्राष्टक से दुग्धाभिषेक करके स्नान करवाये और पुये का भोग लगाकर प्रसाद वितरण करें ।

       

      ३–कर्ज से मुक्ति हेतु –

      ध्यानम्–

       

       शशांकशेषरं शम्भुं वरदं करुणाकरम् । ध्यात्वा शुद्धवपुर्धीमान् रुद्रं रुद्राष्टकं जपेत् ॥

       

      स्नाननादि से शुद्ध होकर बुद्धिमान् प्राणी वरमुद्राधारी करुणासिन्धु भगवान् चन्द्रशेषर का ध्यान करते हुए ११बार रुद्राष्टक का जप करे । आरम्भ चन्द्रवार ( मंडे ) से करना चाहिए । सामग्री कन्या विवाह वाली ही रहेगी । यह प्रयोग सोमवार से शुरु होकर प्रतिदिन करना चाहिए ।प्रत्येक सोमवार को भी कर सकते हैं ।

      जिन महानुभावों को सामग्री मिलना असम्भव हो वे मानस पूजा में वही सामग्री समर्पित करके लाभ ले सकते हैं ।

      – #आचार्यसियारामदासनैयायिक

       

       

       

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      “हनुमज्जयन्ती शब्द हनुमज्जन्मोत्सव की अपेक्षा विलक्षणरहस्यगर्भित है “

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      आज हनुमज्जयन्ती महोत्सव है । आजकल वाट्सएप्प से ज्ञानवितरण करने वाले एक मूर्खतापूर्ण सन्देश सर्वत्र प्रेषित कर रहे हैं कि हनुमज्यन्ती न कहकर इसे हनुमज्जन्मोत्सव कहना चाहिए ; क्योंकि जयन्ती मृतकों की मनायी जाती है । यह मात्र भ्रान्ति ही है ।

      हनुमज्जयन्ती शब्द का औचित्य पहले जयन्ती का अर्थ प्रस्तुत किया जाता है –

       जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः –स्कन्दमहापुराण,तिथ्यादितत्त्व,

       जो जय और पुण्य प्रदान करे उसे जयन्ती कहते हैं । कृष्णजन्माष्टमी से भारत का प्रत्येक प्राणी परिचित है । इसे कृष्णजन्मोत्सव भी कहते हैं । किन्तु जब यही अष्टमी अर्धरात्रि में पहले या बाद में रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो जाती है तब इसकी संज्ञा “कृष्णजयन्ती” हो जाती है –

       रोहिणीसहिता कृष्णा मासे च श्रावणेSष्टमी ।अर्द्धरात्रादधश्चोर्ध्वं कलयापि यदा भवेत् ।

      जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी ।।

       और इस जयन्ती व्रत का महत्त्व कृष्णजन्माष्टमी अर्थात् रोहिणीरहित कृष्णजन्माष्टमी से अधिक शास्त्रसिद्ध है । इससे यह सिद्ध हो गया कि जयन्ती जन्मोत्सव ही है । अन्तर इतना है कि योगविशेष में जन्मोत्सव की संज्ञा जयन्ती हो जाती है । यदि रोहिणी का योग न हो तो जन्माष्टमी की संज्ञा जयन्ती नहीं हो सकती–

       चन्द्रोदयेSष्टमी पूर्वा न रोहिणी भवेद् यदि ।

      तदा जन्माष्टमी सा च न जयन्तीति कथ्यते ॥–नारदीयसंहिता

       कहीं भी किसी मृत व्यक्ति के मरणोपरान्त उसकी जयन्ती नहीं अपितु पुण्यतिथि मनायी जाती है । भगवान् की लीला का संवरण होता है । मृत्यु या जन्म सामान्य प्राणी का होता है । भगवान् और उनकी नित्य विभूतियाँ अवतरित होती हैं । और उनको मनाने से प्रचुर पुण्य का समुदय होने के साथ ही पापमूलक विध्नों किम्वा नकारात्मक ऊर्जा का संक्षय होता है । इसलिए हनुमज्जयन्ती नाम शास्त्रप्रमाणानुमोदित ही है –

       ”जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः” –स्कन्दमहापुराण, तिथ्यादितत्त्व

       जैसे कृष्णजन्माष्टमी में रोहिणी नक्षत्र का योग होने से उसकी महत्ता मात्र रोहिणीविरहित अष्टमी से बढ़ जाती है । और उसकी संज्ञा जयन्ती हो जाती है । ठीक वैसे ही कार्तिक मास में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी से स्वाती नक्षत्र तथा चैत्र मास में पूर्णिमा से चित्रा नक्षत्र का योग होने से कल्पभेदेन हनुमज्जन्मोत्सव की संज्ञा ” हनुमज्जयन्ती”  होने में क्या सन्देह है ??

       एकादशरुद्रस्वरूप भगवान् शिव ही हनुमान् जी महाराज के रूप में भगवान् विष्णु की सहायता के लिए  चैत्रमास की चित्रा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा को अवतीर्ण हुए हैं –

       ” यो वै चैकादशो रुद्रो हनुमान् स महाकपिः। अवतीर्ण: सहायार्थं विष्णोरमिततेजस: ॥

      –स्कन्दमहापुराण,माहेश्वर खण्डान्तर्गत, केदारखण्ड-८/१००

       पूर्णिमाख्ये तिथौ पुण्ये चित्रानक्षत्रसंयुते ॥

       चैत्र में हनुमज्जयन्ती मनाने की विशेष परम्परा दक्षिण भारत में प्रचलित है । 

       इसलिए वाट्सएप्प में कोपी पेस्ट करने वालों गुरुजनों के चरणों में बैठकर कुछ शास्त्र का भी अध्ययन करो  । वाट्सएप्प या गूगल से नहीं अपितु किसी गुरु के सान्निध्य से तत्त्वों का निर्णय करो ।

       —#आचार्यसियारामदासनैयायिक

       

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      श्रीमद्भगवद्गीता, द्वितीय अध्याय,श्लोक-४ की व्याख्या

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      हनुमान् जी

       
      अर्जुन उवाच
       
      कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥४॥
       
      व्याख्या  - पूर्व में अर्जुन ने कहा था कि इस युद्ध में स्वजनों के वध से हमें नरक की प्राप्ति होगी; क्योंकि हमें इनके वध से पाप लगेगा—“पापमेवाश्रयेदस्मान्—“१/३६, मधुसूदन ! हम शोक या मोह के वशीभूत होकर युद्धरूपी स्वधर्म का त्याग नहीं कर रहे हैं अपितु पाप के भय से हम युद्ध नहीं करना चाहते । इसी तथ्य का निरूपण स्वयं पार्थ द्वारा किया जा रहा हैं—कथमित्यादि पदकदम्बों से ।
      भीष्मं= पितामह भीष्म, और ,द्रोणं=आचार्य द्रोण को, संख्ये= युद्ध में, इषुभि:= बाणों से, कथं= कैसे, प्रतियोत्स्यामि= मारूंगा ? अर्थात् किसी भी प्रकार मैं उन्हें नहीं मार सकता ।क्यों ? क्योंकि वे दोनों, पूजार्हौ= पुष्पादि से पूजा के योग्य हैं न कि भयंकर बाणों से वध के योग्य । मधुसुदन= मधु जैसे दुष्ट दैत्य के निहन्ता ! अर्जुन मधुसूदन सम्बोधन से यह ध्वनित कर रहे हैं कि आप दुष्टदैत्यों के प्राणहर्ता हैं ।ऐसे आप मुझे पूज्यों के वध में क्यों प्रेरित कर रहे हैं ?
       
      मधुसूदन और अरिसूदन इन दो सम्बोधनों का प्रयोग प्रभु के लिए पार्थ द्वारा हुआ है । मधुसूदन सरस्वतीपाद कहते हैं कि शोकाकुल अर्जुन को पूर्वापर के परामर्श का वैकल्य होने से ऐसा हुआ है ।शोक से व्याकुल पुरुष को ्यान नहीं रहता इसलिए वह ऐसा कह देता है । फलत:  यह पुनरुक्त दोष नहीं है ।
       
      विचार करें तो मधुसूदन सम्बोधन द्रोणं च के साथ सम्बद्ध है और अरिसूदन पूजार्हौ के साथ । अर्जुन मधुसूदन सम्बोधन से यह कहना चाहते हैं कि आप देव हैं और आपने विजातीय दुष्ट मधु दैत्य का वध किया है । किन्तु मुझे अपने सजातीय सज्जन  पितामह भीष्म और उनके भी पूज्य आचार्य द्रोण का वध करने को कह रहे हैं ।
       
      पूजार्हौ अरिसूदन । शत्रुओं का विनाश करने वाले ! इसका  पूजार्हौ के साथ  सम्बन्ध है । आप रिपुओं का नाश करते हैं और मुझे पूजा करने योग्य अर्थात् शत्रुभाव से विनिर्मुक्त महापुरुषों के विध्वंस हेतु प्रेरित कर रहे हैं । क्या यह उचित है ??
       
      इसलिए पार्थ के द्वारा प्रयुक्त सम्बोधनद्वय विलक्षण भाव को प्रस्तुत करने से सार्थक हैं । फलत: पौनरुक्त्य नहीं ।
       
      पूजार्हौ । वे दोनों पूजा के योग्य हैं ।  अपूज्य की पूजा और पूज्य की अपूजा  दोनों ही अधर्म है । पूज्य की पूजा तथा अपूज्य की अपूजा ये दोनों धर्म हैं । जैसे पूज्य की पूजा विहित होने से धर्म है वैसे ही उनके साथ युद्ध करना महा अधर्म है । यदि कहें कि पूज्यों के साथ युद्ध निषिद्ध न होने से अधर्म नहीं है तो इसका उत्तर सुनें —
       
      गुरुं हुंकृत्य त्वंकृत्य विप्रं निर्जित्य वादत: । श्मशाने जायते वृक्ष: कंकगृद्धोपसेवित:॥
       
      गुरु को हुंकार अथवा त्वम् तुम इस प्रकार अपमानसूचक शब्दों से बोलने वाला तथा ब्राह्मण को वाद  में जीतता है । वह श्मशान में कौआ और गीध से सेवित वृक्ष बनता है । ( यद्यपि वाद उस वार्तालाप को कहते हैं जिसे तत्त्व को जानने की इच्छा से आरम्भ किया जाता है—“ तत्त्वबुभुत्सो: कथा वाद:” । अतएव  श्रेष्ठ होने से  इसे भगवान् ने गीता में “वादः प्रवदतामहम्॥” से  अपनी विभूति में परिगणित किया  ।तथापि  मध्य में विजिगीषा से यदि प्रश्न आदि करके विप्र पर विजय पायी जाय तो जीतने वाला नरकतुल्य कष्ट अवश्य भोगता है । अथवा  कुछ लोगों ने वाद के दो भेद स्वीकार किया है । प्रथम जल्प, द्वितीय वितण्डा । जैसे— तत्र वादो नाम य: परस्परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कतयति । स वादो द्विविध:संग्रहेण जल्पो वितण्डा च . तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्प: । जल्पविपर्ययो वितण्डा ॥-इति चरके विमानस्थानेSष्टमेSध्याये ) 
       
      प्रत्येक स्थिति में जीतने की इच्छा से चलने वाला वार्तालाप तत्त्वनिरूपणफलक न होकर परप्रतिष्ठा का विघातक होने से निक़ृष्ट फल नरकादि देने वाला है ।  वस्तुत: “उद्यते कथ्यते छलपूर्वकमसौ अशास्त्रीय: पक्ष: 
      इति वाद: । इस प्रकार यौगिक व्युत्पत्ति से छलपूर्वक असत् पक्ष का कथन यहां वाद पद से अभीष्ट है । अन्यथा शास्त्ररक्षा एवं वैदिक सनातन धर्म की सुरक्षा हेतु नास्तिक ब्राह्मणको पराजित करने पर भी  नरकादि की प्रसक्ति होगी । अशास्त्रीय पक्ष का प्रतिपादन शास्त्रीय पक्ष का खण्डन ये दोनों विप्र के लिए निरयप्रद हैं ।
      जब गुरु के प्रति हुंकार और त्वंकार जैसे शब्दप्रयोग नरकप्रद होते हैं तब साक्षात् वज्रवत् बाणों का प्रयोग निरयप्रद क्यों नहीं होगा ?? अत एव मैं इनके साथ अधर्मात्मक युद्ध नहीं कर सकता ।
       
      —जय श्रीराम—
       
      #आचार्यसियारामदासनैयायिक
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    • श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय द्वितीय श्लोक की व्याख्या

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      श्रीभगवानुवाच

       कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥

       व्याख्या—अर्जुन के मोह का विद्रावक वचन श्रीभगवान् आरम्भ कर रहे हैं । श्रीभगवान्= श्री आदरसूचक है । समग्र ऐश्वर्य , धर्म ,यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य -इन छहो गुणों का नाम भग है ।ये छहों जिनमें सर्वदा रहते हैं । उन्हें भगवान् कहते हैं । 

       ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशस: श्रिय: । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङगना  ॥—विष्णुपुराण-६/७४,

       इसीलिए पार्थ को ऐश्वर्य, धर्म, यश आदि प्राप्त कराने की इच्छा से भगवान् कहते हैं । 

       हे अर्जुन= पार्थ ! त्वा = तुमको इदं = यह,  कश्मलं= अपने वर्णाश्रमधर्म से पराङ्मुखतारूपी मलिन विचार ( मैं अहिंसा रूपी परम धर्म का पालन करूंगा और भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करूंगा पर युद्ध नहीं करूंगा ), कुत: = कहां से, विषमे= इस अनुपयुक्त स्थल में, समुपस्थितम्= प्राप्त हुआ ? यह, अनार्यजुष्टं= अनार्यों से सेवित अर्थात् आर्यों= शिष्टपुरुषों से त्याज्य है । वेदप्रामाण्य को मानते हुए जो वेदोक्त कर्मों का अनुष्टान करते हैं उन्हें शिष्ट कहा जाता है । धर्म वेदविहित है और अधर्म त्याज्य है । अत: पार्थ ! तुम्हारी यह धर्मपराङ्मुखता मात्र अधर्म है ।यदि तुम मोक्ष की इच्छा से स्ववर्णाश्रमधर्म का त्याग कर रहे हो तो तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता ; क्योंकि धर्म का पालन करने से स्वान्त की शुद्धि होकर भगवत्प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा होती है जिससे मोक्ष प्राप्त होता है । अत: तुम्हारे सदृश मुमक्षुओं को अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए । 

       ध्यातव्य है कि यदि जाति कर्मणा होती तो अर्जुन पर भगवान् मधुसूदन अनार्यजुष्ट शब्द से आक्षेप नहीं करते । और पार्थ माधव की बात भी नहीं मानते । कह देते कि अहिंसा और भिक्षावृत्ति ब्राह्मण का धर्म हैं । मैं उसे स्वीकार करूंगा तब ब्राह्णण हो जाउंगा । किन्तु अर्जुन का ऐसा न कहना सिद्ध करता है कि जाति कर्मणा नहीं अपित् जन्मना ही होती है ।अग्रिम “ स्वधर्मे निधनं श्रेय: —“ से भी यही बात सिद्ध होती है । कर्मणा जाति मानने पर जो कर्म करेंगे उसी के आधार पर जाति सिद्ध होगी फिर वह परधर्म कैसे होगा । यह तो तभी सम्भव है जब हम जाति को जन्मना स्वीकार करें ।अस्तु ।

       अस्वर्ग्यं= स्वर्गविरोधी नरक को प्राप्त कराने वाला, यहां नञर्थ असुर: की भांति विरुद्ध अर्थ में है । अत: स्वर्ग की इच्छा से भी तुम्हें अपने वर्णाश्रमधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए । अहिंसा और भिक्षावृत्ति तुम्हें नरक ले जायेगी । अकीर्तिकरम्= अपकीर्तिकारक, यह धर्मत्याग और परधर्म का सेवन तुम्हारी अपकीर्ति का जनक होगा । अत: चाहे मोक्ष की इच्छा हो या स्वर्ग अथवा कीर्ति की । इसके लिए तुम्हें यह विषाद और अहिंसा को परम धर्म समझना तथा भिक्षा वृत्ति से जीवन निर्वाह की इच्छा इन सबका त्याग करना ही पड़ेगा । इन सबको भगवान् आगे क्लैब्य शब्द से कहेंगे । 

       आज हिन्दुओं को जो अहिंसा का पाठ पढाने के साथ सहनशीलता सिखायी जाती है ।और भिक्षावृत्ति बनाम जीती हुई जमीन दुष्टों को लौटायी गयी या लौटायी जाती है । उसी का परिणाम है देश में आतंकवाद और नापाक देश की सीमा पर काली करतूतें तथा विदेशी बर्बर मुश्लिमों को शरणार्थी मानना ।

       गीता के द्वारा यही सन्देश दिया जा रहा है कि वर्तमान परिस्थिति में दुष्टों का दलन, उनकी भूमि पर धर्मपूर्वक प्रजापालन और लुटेरे मुश्लिमों का निष्कासन यही राष्ट्रधर्म है । जो देशद्रोह करे वह प्रजा नहीं ।

       —#आचार्यसियारामदासनैयायिक

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    • श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय —१

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      श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीयोSध्याय: 

      संजय उवाच

       तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: ॥१॥

      ऑ व्याख्या— अहिंसा और उसके साथ भिक्षा मांगकर खाना परम धर्म है — इस प्रकार की सोच से युद्धविमुख अर्जुन को जानकर धृतराष्ट्र को हर्ष हुआ । हमारे पुत्र का राज्य अब अचल हो गया – इस विचारधारा में प्रवहमान प्रसन्नचित्त धृतराष्ट्र की “इसके बाद क्या हुआ” -इत्याकारक जिज्ञासा के शमनार्थ संजय बोले ।तथा= उस प्रकार, कृपयाविष्टं= मैं इनका सम्बन्धी हूं और ये मेरे सम्बन्धी हैं-इस प्रकार भ्रमात्मकनिश्चय से जन्य स्नेहविशेषात्मक कृपा से आविष्ट, अश्रुपूर्णकुलेक्षणं= आंसुओं से भरे तथा देखने में असमर्थ,एवं, विषीदन्तं= विषादग्रस्त, तं= उन पार्थ से,इदं = वक्ष्यमाण= आगामी, वाक्यं= वचन, मधुसूदन=स्वयं मधु जैसे वेदविज्ञान के अपहर्ता दुष्ट का विध्वंस करने वाले भगवान् बोले ।

       कृपयाविष्टं+ जैसे भूत से आविष्ट व्यक्ति में भूतावेश आगन्तुक दोष है वैसे ही यह अर्जुननिष्ठकृपाख्य स्नेह है—यह शंका नहीं करनी चाहिए; क्योंकि यह मेरा है और मैं इसका हूं—इस तरह के व्यामोह से जीव सदा ही ग्रस्त रहता है ।अत: यह स्वाभाविक है । भूतावेश सभी को नहीं होता और वह सदा नहीं रहता इसलिए उसे आगन्तुक कहते हैं । आगन्तुक दोषों को हटाया जा सकता है । पर अहन्ता और ममता को सद्गुरु के तत्त्वोपदेश विना कोई नहीं हटा सकता । इसीलिए अग्रिम “कुत्स्त्वा कल्मषमिदं—“ इत्यादि सोपपत्तिक 

      वचनात्मक गीतोपदेश भगवान् प्रारम्भ करते हैं ।

       

      मधुसूदन:— मधु जैसे दुष्ट का विनाश करने वाले भगवान् आपके दुर्योधन आदि दुष्ट पुत्रों का  भीम आदि से प्रणाश अवश्य करा देंगे । इसलिए आपको अर्जुन की युद्धविमुखता से प्रसन्न नहीं होना चाहिए ।

       विषीदन्तं= विषादं कुर्वन्तं, विषाद कर्म है और अर्जुन कर्ता । विषाद दोष आगन्तुक होने से उसका विनाश सहज दोष की अपेक्षया सुकर है ।

      —#आचार्यसियारामदासनैयायिक

       

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